Thursday, February 5, 2026
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पार्क और खेल मैदान की ज़मीन पर झुग्गी पुनर्वास पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, महाराष्ट्र सरकार और बीएमसी से मांगा जवाब

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महाराष्ट्र सरकार, बृहन्मुंबई नगर निगम बीएमसी) और झुग्गी पुनर्वास प्राधिकरण (एसआरए) सहित अन्य पक्षों से उस याचिका पर जवाब तलब किया है, जिसमें बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसने पार्क, बगीचों और खेल के मैदानों के लिए आरक्षित ज़मीन पर झुग्गी पुनर्वास योजनाओं की अनुमति दी थी। यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया, जहां वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दलीलें पेश करते हुए कहा कि मुंबई जैसे घनी आबादी वाले शहर में सार्वजनिक खुले स्थानों की सुरक्षा बेहद ज़रूरी है और इन ज़मीनों पर निर्माण से शहर की पर्यावरणीय सेहत और नागरिकों के जीवन स्तर पर गंभीर असर पड़ेगा। कोर्ट ने इसके बाद महाराष्ट्र सरकार, एसआरए, बीएमसी और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने जून 2025 में ‘डेवलपमेंट कंट्रोल एंड प्रमोशन रेगुलेशंस 2034’ (डीसीपीआर) के नियम 17 को वैध ठहराते हुए कहा था कि हरियाली की कमी और झुग्गीवासियों के आवास के संवैधानिक अधिकार के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है। यह नियम उन भूखंडों पर भी झुग्गी पुनर्वास योजनाओं की अनुमति देता है जो मूल रूप से पार्क, बगीचों और खेल के मैदानों के लिए आरक्षित थीं, बशर्ते ज़मीन का एक हिस्सा सार्वजनिक उपयोग के लिए वापस बहाल किया जाए। हाई कोर्ट की जस्टिस अमित बोरकर और जस्टिस सोमशेखर की पीठ ने ‘NAGAR’ की याचिका को खारिज करते हुए कानून की वैधता को बरकरार रखा था, लेकिन साथ ही 17 बिंदुओं वाला एक सख्त निर्देश भी जारी किया था ताकि छोड़े गए खुले स्थान केवल कागज़ों तक सीमित न रहें और वास्तव में आम लोगों के लिए सुलभ हों। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि आरक्षित खुले स्थानों के 65 प्रतिशत तक के हिस्से पर निर्माण की अनुमति देना “अतिक्रमण को कानूनी जामा पहनाने” जैसा है और यह ‘पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन’ का उल्लंघन है, जिसके तहत सरकार सार्वजनिक संपत्तियों की केवल ट्रस्टी होती है, मालिक नहीं। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई से अब मुंबई में शहरी विकास, पर्यावरण संरक्षण और झुग्गी पुनर्वास नीति के बीच संतुलन को लेकर एक बार फिर बड़ा संवैधानिक और नीतिगत सवाल खड़ा हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का असर केवल मुंबई ही नहीं, बल्कि देश के अन्य महानगरों की शहरी नियोजन नीतियों पर भी पड़ सकता है।

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