
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनावों की अधिसूचना जारी करे और आगामी चार महीनों के भीतर चुनावी प्रक्रिया पूरी करे। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन.कोटिश्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि चुनावों में ओबीसी आरक्षण की स्थिति वर्ष 2022 में बांठिया आयोग की रिपोर्ट से पहले जैसी ही रहेगी। पीठ ने कहा कि चुनाव परिणाम सुप्रीम कोर्ट में लंबित संबंधित याचिकाओं के निर्णयों के अधीन रहेंगे। साथ ही आयोग को उचित परिस्थिति में अधिक समय मांगने की छूट भी दी गई है।
बांठिया आयोग और ओबीसी आरक्षण विवाद
बांठिया आयोग ने ओबीसी जनसंख्या के सटीक आंकड़ों की सिफारिश की थी और स्थानीय निकाय चुनावों में 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव रखा था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में 2010 के आदेश के अनुरूप “ट्रिपल टेस्ट” की शर्त पूरी किए बिना ओबीसी को आरक्षण देने से इनकार कर दिया था और 2021 में राज्य निर्वाचन आयोग की अधिसूचना को रद्द कर दिया था।
लोकतंत्र के ठप होने पर कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि जब सरकार पहले ही कुछ ओबीसी वर्गों की पहचान कर चुकी है, तो चुनाव क्यों रोके जा रहे हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “मुकदमेबाजी के चलते आज अधिकारी नगर निगम और पंचायतों पर काबिज हैं और जवाबदेही खत्म हो चुकी है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया रुक गई है।”
राज्य सरकार और आयोग के रुख पर कोर्ट की नाराज़गी
पीठ ने कहा कि यदि कुछ सीटें गलत तरीके से आरक्षित या अनारक्षित कर दी जाती हैं, तो भी चुनाव टाले नहीं जा सकते। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह किसी स्थायी संरचना का चुनाव नहीं है, बल्कि केवल एक कार्यकाल के लिए है। ज्ञात हो कि 2022 में, सरकार ने ओबीसी को 27% आरक्षण देने के लिए अध्यादेश जारी किया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विपरीत मानते हुए चुनाव आयोग को चुनाव प्रक्रिया रोकनी पड़ी थी। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा दायर याचिका को खारिज कर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देश के तहत, राज्य में लंबे समय से रुके स्थानीय निकाय चुनावों का रास्ता साफ हो गया है।




