
मुंबई। शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र सामना में आज प्रकाशित एक संपादकीय में उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे के बीच रिश्तों में बढ़ती दरार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इस संपादकीय में आरोप लगाया गया है कि फडणवीस और शिंदे के बीच अब कोई गहरा संबंध नहीं है और भाजपा ने शिंदे और उनके लोगों की जासूसी तक करवाई है। इसके परिणामस्वरूप शिंदे अब राजनीतिक रूप से कमजोर हो चुके हैं और उनका मानसिक स्वास्थ्य भी खराब हो गया है। संपादकीय के अनुसार, शिंदे अब भी मुख्यमंत्री पद न मिलने के सदमे से उबरने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं और उनका राजनीतिक भविष्य पूरी तरह निश्चित नहीं है। सामना ने यह दावा किया है कि शिंदे के मानसिक तनाव का कारण उनकी उम्मीदों का टूटना है, खासकर जब अमित शाह ने उन्हें चुनावों में दिल खोलकर खर्च करने का वादा किया था, लेकिन उस वादे को पूरा नहीं किया गया।
राजनीतिक स्थिति और शिंदे की मनोदशा
संपादकीय में यह भी कहा गया कि शिंदे अब भी मुख्यमंत्री बनने की उम्मीदों में टूट चुके हैं और उनके पास किसी भी राजनीतिक रणनीति की स्पष्टता नहीं है। इसके अलावा, शिंदे के मनोबल में गिरावट की बात कही गई है। उनके एक प्रिय विधायक ने इस बारे में बात करते हुए बताया कि शिंदे सरकारी बैठकों में भी देर से पहुंचते हैं और कई बार बिना किसी दिलचस्पी के बैठकों में हिस्सा लेते हैं। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां उनकी गतिविधियों पर नजर रख रही हैं, जिससे उनकी स्थिति और कमजोर हो गई है। संपादकीय में यह भी उल्लेख किया गया है कि देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा की नीति शिंदे पर अब ज्यादा दबाव बना रही है। फडणवीस ने शिंदे को राजनीतिक रूप से कमजोर कर दिया है और अब उनकी अहमियत सुन्य हो चुकी है। सामना के अनुसार, फडणवीस ने शिंदे को पूरी तरह से नकारा कर दिया है, जो उन्हें मुख्यमंत्री पद की चाहत में कमजोर कर रहा है।
अजित पवार की स्थिति मजबूत
इस संपादकीय में अजित पवार के बारे में यह कहा गया है कि उनकी स्थिति शिंदे से कहीं बेहतर है। अजित पवार ने खुद को सीमित रखा है और फडणवीस के साथ अच्छे रिश्ते बनाए हैं, जिससे वे ईडी जैसी एजेंसियों से बच पाए हैं। भा.ज.पा. के साथ उनके गठबंधन के परिणामस्वरूप उन्हें उपमुख्यमंत्री पद भी मिला है, और वे खुश हैं कि उनका राजनीतिक अस्तित्व सुरक्षित है।
शिंदे की राजनीतिक स्थिति का संकट
शिंदे की पार्टी में राजनीतिक अस्थिरता और गुमराह नेता के संकेत मिल रहे हैं। संपादकीय में यह स्पष्ट किया गया कि शिंदे की पार्टी में अब कोई स्थिर नीति नहीं है और उनका राजनीतिक पतन अब सुनिश्चित है। यदि वे भाजपा के कठोर दबाव के सामने नहीं झुके, तो उनका राजनीतिक करियर समाप्त हो सकता है। संपादकीय में शिंदे के बारे में यह भी कहा गया कि उन्हें अब अमित शाह का समर्थन तो प्राप्त है, लेकिन यह समर्थन केवल सतही है और जैसे ही उनका काम पूरा हो जाएगा, शिंदे का राजनीतिक वजूद खत्म हो जाएगा।
राजनीतिक संकट की चेतावनी
अंत में, संपादकीय ने शिंदे के खिलाफ बढ़ते राजनीतिक दबाव और भा.ज.पा. के अंदर जोरदार तकरार के कारण महाराष्ट्र की राजनीति में अराजकता और अस्थिरता के संकेत दिए हैं। साथ ही, यह भी कहा गया कि जैसे-जैसे शिंदे की सत्ता की राजनीति टूटेगी, उन्हें घाव महसूस होने लगेंगे। सामना के संपादकीय ने स्पष्ट रूप से यह चेतावनी दी कि शिंदे की राजनीतिक यात्रा का अंत अब समय की बात है। शिंदे की पार्टी के पास अब कोई स्पष्ट नीति नहीं है, और उनका राजनीतिक पतन नजदीक है।




