Monday, March 9, 2026
Google search engine
HomeIndiaव्यंग्य: जीतने वाले की सदा ही जय जय

व्यंग्य: जीतने वाले की सदा ही जय जय

सुधाकर आशावादी              
हिचकोले खाते खाते आखिर नैया पार हो ही गई और भारत फटाफट क्रिकेट का चक्रवर्ती सम्राट बन गया। क्रिकेट और हॉकी में यही अंतर है, कि हॉकी बाई प्रैक्टिस होती है और क्रिकेट बाईचांस। क्रिकेट में बाइचांस बहुत कुछ होता है। कभी कभी कोई कमजोर समझी जाने वाली टीम दिग्गज कही जाने वाली टीम के छक्के छुड़ा देती है और कभी कोई दिग्गज खिलाड़ी शून्य पर आउट होकर बत्तख बन जाता है। खिलाड़ी का भी ख़ास दिन होता है, गेंद बल्ले के खेल में कब किस खिलाड़ी की बल्ले बल्ले हो जाए, खिलाड़ी खुद नहीं जानता। कब किसी खास टीम के लिए अभिशप्त समझे जाने वाले खेल मैदान में कोई कर्मयोगी टीम टोने टोटके और मिथकों को धराशायी करके आलोचकों का मुंह बंद कर दे, इसकी भविष्यवाणी भी नहीं की जा सकती। एक दौर था कि जब हर कोई पत्रकार या खेल समीक्षक नहीं हुआ करता था। खेल की समीक्षा चाय की दुकान और पान के खोखे की परिधि से बाहर नहीं निकल पाती थी। सोशल मीडिया का तो नामोनिशान न था लेकिन आजकल जिसे घर में प्लास्टिक के बल्ले और प्लास्टिक की बॉल से क्रिकेट खेलना नहीं आता है, वह भी स्वयं को क्रिकेट का विशेषज्ञ समझता है। क्रिकेट में हर बॉल और हर शॉट पर सोशल मीडिया की नजर रहती है। खेल के परिणाम से पहले ही स्वयंभू विश्लेषक जीत हार की भविष्यवाणी कर देते हैं। खेल शुरू होने से पहले ही मनचाही टीम को विजयी घोषित कर देते हैं। बहरहाल खिलाड़ियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। खिलाड़ी यदि सभी की बातों पर ध्यान देने लगे या किसी ज्योतिषी की भविष्यवाणी को सच मानने लगे, तो मैदान में उतरने से पहले सौ बार सोचना उसकी मज़बूरी बन जाएगी। ताज्जुब तो तब होता है, कि जब सोशल मीडिया खिलाडियों के खेल को नहीं, बल्कि उसकी जाति को जीत या हार का श्रेय देने लगता है। सोशल मीडिया पर टीम का चयन कर दिया जाता है, वह भी बिना चयनकर्ताओं की मर्जी के। किसी मैच में किसी भी खिलाड़ी के फ्लॉप प्रदर्शन पर त्वरित टिप्पणी करके उसकी जाति से उसके चयन पर ही सवाल खड़े किए जाते हैं। टूर्नामेंट में फाइनल तक पहुँचने के लिए सभी टीमें एड़ी से चोटी तक का जोर लगाती हैं, फिर भी दिग्गज खिलाडियों से सन्नद्ध कोई टीम टूर्नामेंट के सेमी फाइनल में स्थान बनाने से वंचित रह जाती है। कोई कमजोर समझी जाने वाली टीम फाइनल तक पहुँचने की दौड़ में बनी रहती है। किसी टीम का जब समय ख़राब होता है, तो विशेषज्ञ कहे जाने वाले खिलाड़ी ग्राउंड फील्डिंग में कैच छोड़ने लगते हैं, बॉलर पिटने लगते हैं। जब पिटने लगते हैं, तब उन्हें दिन में तारे नजर आने लगते हैं। पकड़ो कैच जीतो मैच का सूत्र फ्लॉप हो जाता है। एक समय था, जब फील्डिंग की प्रैक्टिस अधिक की जाती थी, फील्डिंग के आधार पर कोई खिलाड़ी टीम इलेविन में स्थान बना लेता था। अब केवल बैटिंग और बॉलिंग विशेषज्ञ अधिक रखे जाते हैं, हिट मैन हिट तो बखूबी करता है, लेकिन फील्डिंग के लिए फिट नहीं होता, कैच टपकाता है और मैच गंवाता है। फिर भी यदि मुकद्दर में जीत है, तो खिलाड़ी सिकंदर बन ही जाते हैं। जीत का सेहरा कप्तान के सर पर बँधता है। जबकि परिश्रम पूरी टीम का होता है। रिकार्ड बनते हैं, बिगड़ते हैं। क्रिकेट में कब कौन हारते हारते जीत जाए, पहले से निश्चित नहीं होता, यही क्रिकेट की विशेषता है। वैसे खेल चाहे कोई भी हो, जीत हार खेल के अंग होते हैं, जीत किसी की कभी स्थाई नहीं होती, पर जीतने वाले की सदा ही जै जै होती है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments