Friday, March 27, 2026
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संत रविदास: प्रेम, एकता और समानता के संदेशवाहक


इंजी.अतिवीर जैन ‘पराग’
पन्द्रहवीं शताब्दी में जब देश में जात-पात, ऊंच-नीच और धार्मिक भेदभाव अपने चरम पर था, संत रविदास का जन्म माघ पूर्णिमा को सन् 1377 में सीरगोवर्धन गांव में वाराणसी जिले के अंतर्गत हुआ। आज भी हर वर्ष माघ पूर्णिमा पर संत रविदास जयंती मनाई जाती है, प्रभात फेरियां निकाली जाती हैं। धार्मिक उत्सव के रूप में इनका जन्मदिन दिवस पूरे देश मे मनाया जाता है। आपके जन्म और मृत्यु दोनों के बारे में मतभेद है। संत रविदास का सामाजिक कार्यकाल 1450 से 1520 के बीच के बीच माना जाता है और आयु 120 से 150 साल के करीब बताई जाती है। संत रविदास की माता का नाम कलसा देवी था और पिता का नाम संतोषदास रघु था। आपके पिता पेशे से चर्मकार थे और जूते चप्पल बनाने का काम करते थे। आपकी शादी लोनादेवी से हुई। आपका एक पुत्र विजयदास और पुत्री रविदासिनी हुई। बताया जाता है कि आपके जन्म का दिन रविवार था, इसलिए इनका नाम रविदास रखा गया।
बचपन में रविदासजी अपने गुरु पंडित शारदानंद जी की पाठशाला में जाते थे हालांकि पंडितजी का कुछ लोगों ने विरोध भी किया पर पंडितजी ने रविदासजी की योग्यता और व्यवहार देखकर उन्हें अपने यहां शिक्षा देना जारी रखा। गुरुजी पहचान गए थे कि रविदासजी कोई साधारण बालक नहीं हैं बल्कि ईश्वरीय गुणों से भरपूर हैं जो सामाजिक सुधारक के रूप में प्रसिद्ध होंगे। संत रविदास काशी के स्वामी रामानंदाचार्य के शिष्य थे। संत कबीर उनके समकालीन गुरु भाई थे।
रविदासजी को कबीर ने संत रविदास कहा। इन्हें संत शिरोमणि,सतगुरु की उपाधि दी गई।
तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था को देखकर संत रविदासजी ने कहा था- जाति-जाति में जाति है, जो केतन के पात।
रैदास मनुष न जुड़ सके, जब तक जाति न जात।
अर्थात्‌ समाज में जातियां केले के पेड़ के तने के समान है जिसको जितना ही छीलो पेड़ खत्म हो जाता है और कुछ नहीं मिलता। इसी प्रकार समाज में जाति-जाति करने से कुछ नहीं मिलेगा इंसान खत्म हो जाएगा। रविदास जी ने कहा –
” जनमजात मत पूछिए, का जात अरु पात।
रैदास पूत सब प्रभु के, कोए नहिं जात कुजात।। किसी की जाति नहीं पूछनी चाहिए क्योंकि संसार में कोई जाति पाँति नहीं है l सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान है। आपने कहा-
‘ईश्वर ने इंसान बनाया है ना कि इंसान ने ईश्वर बनाया है’
और जब ईश्वर ने इंसान बनाया है तो सभी इंसान एक समान बनाए हैं इसलिए सभी का इस पृथ्वी पर समान अधिकार हैl रविदास जी ने कहा मनुष्य किसी भी जाति में जन्म लेने से नीच या छोटा नहीं हो जाता। मनुष्य अपने कर्मों से पहचाना जाता है और जो नीच कर्म करता है वही नीच होता है।
” रविदास जन्म के कारने,होत न कोई नीच।
नर कुं नीच करि डारि है ,ओछ कर्म की कीच।।
रविदास सभी प्रकार के भेदभाव को निरर्थक बताते थे। और सभी को प्रेम पूर्वक मिलजुल कर रहने का उपदेश देते थे। उनका मानना था कि राम, कृष्ण, करीम ,राघव सब एक ही परमेश्वर के अलग-अलग नाम है। वेद, कुरान, पुराण, सभी में एक ही परमेश्वर का जिक्र हैं। आपने कहा- कृष्ण, करीम, राम, हरी, राघव, जब लग एक न पेखा। वेद, कतेब, कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।
रविदास कहते थे भक्ति में ही शक्ति है और जो मनुष्य दिन और रात राम का नाम जपता है वह राम के समान हो जाता है और उसमें कोई भी क्रोध और काम भावना नहीं रहती –
” रैदास कहे जाके हदे ,रहे रैन दिन राम।
सो भगता भगभंत सम , क्रोध न व्यापे काम ।।
उनका कहना था कि अभिमान को त्याग कर काम करने वाला व्यक्ति ही जीवन में सफल हो सकता है। जैसे विशालकाय हाथी शक्कर के दानों को नहीं चुन सकता जबकि एक लघु पीपलीका यानी चींटी चक्कर के दानों को आराम से चुन लेती है। इसी प्रकार अभिमान और बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रता पूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है।
“कह रैदास तेरी भक्ति दूरी है, भाग बड़े सो पावे।
तजि अभिमान मेटी आपा पर, पीपीलक हवे चुनी खावे।।
एक बार एक पर्व पर उनके पड़ोस के लोग गंगा-स्नान के लिए जा रहे थे । रविदासजी के शिष्यों ने भी उनसे गंगा-स्नान चलने के लिए कहा। रैदास ने कहा कि मैंने पहले से ही अपने एक ग्राहक को जूता देने का वादा कर रखा है और अब मेरी वहीं प्राथमिक जिम्मेदारी है।अगर मैं गंगा- स्नान पर चला भी गया तो मेरा मन तो इस काम में लगा रहेगा फिर मुझे पुण्य कैसे मिलेगा? अत:मनुष्य को वही काम करना चाहिए जो उसका अंतःकरण करने को तैयार हो। मन सही है तो मेरे कठौती के जल में ही गंगा स्नान का पुण्य प्राप्त हो जाएगा अर्थात -“मन चंगा तो कठौती में गंगा। ” (कठौती यानी एक बर्तन जिसमें चमड़े को भिगोया जाता है)
संत रविदास के शिष्यों में कृष्णभक्त मीराबाई, चित्तौड़ के राणा सांगा की पत्नी झाला रानी, सिकंदर लोदी, राजा पीपा, राजा नागरमल, आदि अन्य कई शासक राजा थे। चित्तौड़ के किले में भी संत रविदास की छतरी बनी हुई है। वाराणसी में गुरु रविदास स्मारक और पार्क बना हुआ है। वही पर गुरु रविदास घाट हैं। बताया जाता है काशी नरेश ने उनकी दैवीय शक्तियों से प्रभावित होकर दलितों को पूजा का अधिकार दिया था और उनके अनुयायी बन गए थे। संत रविदास जी के पूरे देश में जगह-जगह मंदिर बने हुए हैं। जहां पर आध्यात्मिक रूप से संत रविदास जी को लोगों द्वारा पूजा जाता है। रविदास जी एक महान संत,दर्शन शास्त्री, समाज सुधारक और ईश्वर के उपासक थे। आपके चालीस पदों को पांचवें सिख धर्म गुरु अर्जनदेव ने सिखों के पवित्र धर्म ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल किया था। रविदास जी ने जात-पात का, ऊंच नीच, छुआछूत, भेदभाव का विरोध किया और मानव को आत्मज्ञान ग्रहण कर आत्मकल्याण का मार्ग बताया। आपकी कविताओं में अवधी, राजस्थानी,खड़ी बोली, उर्दू, फारसी के शब्दों का मिश्रण है। आज हमारे देश में लोकतंत्र होते हुए भी वोटों की राजनीति के चलते जातिवादी नेता देश के जनमानस को जाति-धर्म में बांट रहे हैं। ऐसे में संत रविदासजी के उपदेशों पर चल समाज को एक बनाने का प्रयास करना होगा तभी मानवता बच पाएगी। संत रविदास जयंती के इस शुभ अवसर पर हम सब संकल्प लें कि समाज से जात-पांत का भेदभाव मिटाएंगे, ऊँच-नीच को दूर करेंगे,ग़रीबी को मिटाएंगे एक दूसरे का सम्मान करेंगे। यही रविदास जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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