Tuesday, February 24, 2026
Google search engine
HomeIndiaइश्क़ को इबादत बनाने वाले शायर— पंडित रामकृष्ण मिश्रा ‘वैरागी’ को सलाम

इश्क़ को इबादत बनाने वाले शायर— पंडित रामकृष्ण मिश्रा ‘वैरागी’ को सलाम

पूनम दुबे

पंडित रामकृष्ण मिश्रा ‘वैरागी’ — वो नाम, जिसे सिर्फ़ पढ़ा नहीं जाता, महसूस किया जाता है। जिनके लफ़्ज़ ज़ुबान से कम और रूह से ज़्यादा बोले जाते हैं। पेशे से एक सफल वकील और मुंबई में अपनी विधिक सेवाएँ देने वाले ‘वैरागी’ साहब अपनी पेशेवर ज़िंदगी में न्याय की पैरवी करते हैं, तो अदबी दुनिया में इश्क़, वफ़ा और रूहानियत की। उनके कलाम में इश्क़ की तासीर है, वफ़ा का रंग है, वैराग का असर है और आशिक़ की बेइंतहा तड़प भी। ‘वैरागी’ के अशआर दिल को छूते नहीं- दिल में उतर जाते हैं। हर मिसरे में सादगी, हर नज़्म में सूफ़ियाना गहराई और हर शेर में इबादत की ख़ुशबू बसती है। कभी आशिक़ की तड़प, कभी फ़क़ीर की मुस्कराहट, तो कभी रूमानी अंदाज़— उनकी लिखावट में ऐसी रूहानी नर्मी है, जो ख़ुदा और ईश्वर की नज़दीकियों का एहसास कराती है।
अल्फ़ाज़ इतने पाक और महीन-
जैसे हर लफ़्ज़ सजदे में ढल गया हो।
जब उनका क़लम चलता है तो मोहब्बत इबादत बन जाती है और इश्क़ एक मज़हब। उन्होंने सिर्फ़ कहा नहीं, जिया भी-
एक वादा मैं करूँ, एक वादा तुम करो,
इश्क़ आधा मैं करूँ, इश्क़ आधा तुम करो।

उल्फत के धागे ज़रा खोल देना,
है हमसे मोहब्बत ज़रा बोल देना।
बूंदों से है बगावत ज़रा बोल देना,
है हमसे मोहब्बत ज़रा बोल देना।

तेरा मेरा ताल्लुक मुसाफ़िराना है ,
सफ़र में साथ है तू, मगर बेग़ाना है।

इश्क मोहब्बत जाने वफा, नाम तेरा रख देंगे
मेरा दिल तुम रख लेना , तेरा दिल हम रख लेंगे।
ये अल्फ़ाज़ कहे नहीं जाते- महसूस किए जाते हैं। और यही है ‘वैरागी’ साहब का असल मकाम।
वकालत की दुनिया में तर्क और दलीलों के बीच रहने वाले इस शायर ने अपने दिल में मोहब्बत की ऐसी शमा जलाई है, जो अदब के आसमान पर रौशनी बिखेरती है। उनकी शायरी में इश्क़ सिर्फ़ एहसास नहीं- एक साधना है, एक रूहानी सफ़र है, जो पाठक को भीतर तक छू जाता है। सलाम है उस शायर–वकील को, जिसने न्याय के पेशे में रहते हुए भी इश्क़ को अपनी पहचान बना लिया।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments