Wednesday, March 25, 2026
Google search engine
HomeCrimeरीवा सर्किट हाउस गैंगरेप मामला: रसूख पर कानून भारी, महंत समेत पाँच...

रीवा सर्किट हाउस गैंगरेप मामला: रसूख पर कानून भारी, महंत समेत पाँच दोषियों को ‘अंतिम सांस’ तक उम्रकैद

इंद्र यादव
जबलपुर, एमपी।
रीवा के राजनिवास (सर्किट हाउस) से उठी वह चीख, जिसने साढ़े तीन साल पहले पूरे विंध्य अंचल और प्रदेश की आत्मा को झकझोर दिया था, आखिरकार न्याय की दहलीज पर सुकून पा गई है। विशेष न्यायालय (पॉक्सो) की माननीय न्यायाधीश पद्मा जाटव ने मुख्य आरोपी महंत सीताराम उर्फ समर्थ त्रिपाठी सहित पाँच दोषियों को ‘प्राकृतिक जीवन के अंत तक’ उम्रकैद की सजा सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि अपराध चाहे कितना भी रसूखदार क्यों न हो, कानून के हाथ उसकी गर्दन तक पहुँच ही जाते हैं। अदालत ने सभी दोषियों पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। यह मामला केवल एक जघन्य गैंगरेप की घटना नहीं, बल्कि आस्था, सत्ता और व्यवस्था के दुरुपयोग का प्रतीक बन गया था। जिस चेहरे को समाज ‘महंत’ कहकर सम्मान देता था और जिस सरकारी राजनिवास से सुरक्षा व प्रशासन की उम्मीदें जुड़ी थीं, वहीं एक नाबालिग बच्ची के साथ हैवानियत की गई। अभियोजन के अनुसार, विनोद पांडे ने काम का झांसा देकर बच्ची को सर्किट हाउस के कमरा नंबर-4 में बुलाया, जहाँ महंत सीताराम, धीरेंद्र मिश्रा, अंशुल मिश्रा और मोनू पयासी ने मिलकर उसे नशीली शराब पिलाकर दरिंदगी का शिकार बनाया। जांच और अदालत की कार्यवाही के दौरान सामने आए तथ्य रोंगटे खड़े कर देने वाले रहे। आधी रात की उस हैवानियत के बाद पीड़िता बदहवास हालत में जान बचाने के लिए चलती कार से सड़क पर कूद गई। शरीर पर लगे जख्म तो भर सकते हैं, लेकिन उस रात उसकी आत्मा पर पड़े घाव जीवन भर का दर्द बन गए। यह छलांग केवल कार से नहीं, बल्कि समाज की क्रूरता और सत्ता-संरक्षित हैवानियत से बच निकलने की एक आखिरी कोशिश थी। मामले में कुल नौ आरोपी बनाए गए थे, जिनमें से साक्ष्यों के अभाव में चार- संजय त्रिपाठी, रविशंकर शुक्ला, जानवी दुबे और तौसीद अंसारी को अदालत ने बरी कर दिया। हालांकि यह सवाल अब भी समाज के सामने खड़ा है कि अपराधियों को संरक्षण देने और उन्हें बचाने वाला तंत्र कितना मजबूत है। जब ‘धर्म’ और ‘पद’ का चोला पहनकर ऐसे कृत्य किए जाते हैं, तो न केवल एक परिवार टूटता है, बल्कि पूरे सामाजिक और नैतिक ढांचे पर गहरा आघात लगता है। अदालत का यह फैसला न्याय की एक मजबूत मिसाल के रूप में देखा जा रहा है। ‘अंतिम सांस तक’ उम्रकैद की सजा और आर्थिक दंड उन सभी के लिए कड़ा संदेश है, जो सत्ता, पैसे और प्रभाव के बल पर मासूमों को अपनी जागीर समझते हैं। यह निर्णय बताता है कि देर से सही, लेकिन न्याय मिलता है और कानून के सामने कोई भी अपराधी अछूता नहीं रह सकता।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments