Friday, March 27, 2026
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केंद्र की जमीनों पर बसे लाखों झुग्गीवासियों के पुनर्वास को मिले जल्द मंजूरी: सांसद नरेश म्हस्के

ठाणे। महाराष्ट्र के मुंबई, ठाणे, कल्याण, डोंबिवली और अंबरनाथ क्षेत्रों में रेलवे, डिफेंस और एमटीएनएल की जमीनों पर बसे करीब 2 लाख 15 हजार झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोगों के पुनर्वास का मुद्दा संसद में उठाया गया। सांसद नरेश म्हस्के ने ‘ज़ीरो आवर’ के दौरान केंद्र सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि इन क्षेत्रों में रहने वाले लाखों लोगों को पक्के घर देने और देश की संपत्ति की सुरक्षा के लिए महाराष्ट्र सरकार की प्रस्तावित पुनर्वास नीति को जल्द मंजूरी दी जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि रेलवे, डिफेंस और एमटीएनएल जैसे केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों की जमीनों पर बसे लगभग 2.15 लाख परिवारों के पुनर्वास का मामला लंबे समय से लंबित है। इस संबंध में महाराष्ट्र सरकार ने केंद्र सरकार को एक विस्तृत प्रस्ताव सौंपा है, जिसमें सरकारी जमीनों को अतिक्रमण से मुक्त कर गरीबों को स्थायी आवास उपलब्ध कराने की योजना शामिल है। पुनर्वास प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए राज्य सरकार ने केंद्र के सामने तीन विकल्प रखे हैं। पहला, जहां संभव हो, इन-सीटू डेवलपमेंट लागू किया जाए, जिसमें राज्य सरकार रेडी-रेकनर दर का 25 प्रतिशत केंद्र को देगी और SRA नियमों के तहत जमीन का विकास करेगी या विकसित जमीन का 25 प्रतिशत हिस्सा केंद्र को लौटाया जाएगा। दूसरा, यदि सुरक्षा या तकनीकी कारणों से उसी स्थान पर पुनर्वास संभव नहीं है, तो केंद्र सरकार जमीन की लागत का 75 प्रतिशत राज्य सरकार को प्रदान करे, जिससे प्रभावित लोगों को अन्य स्थान पर बसाया जा सके। तीसरा, केंद्र सरकार चाहे तो रेलवे लैंड डेवलपमेंट अथॉरिटी या अपनी किसी एजेंसी के माध्यम से राज्य सरकार के सहयोग से पुनर्वास योजना लागू कर सकती है। सांसद म्हस्के ने यह भी स्पष्ट किया कि पात्रता के लिए राज्य सरकार के दिशा-निर्देश लागू किए जाएंगे, हालांकि सहमति न बनने की स्थिति में प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के मानदंडों को अपनाने के लिए राज्य तैयार है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार अतिक्रमित जमीनों का विकास करना चाहती है, लेकिन पिछले 50-60 वर्षों से वहां रह रहे गरीब परिवारों को नजरअंदाज कर विकास नहीं किया जा सकता। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि पुनर्वास नीति बनाते समय मानवीय दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है, ताकि लोगों के रोजगार, बच्चों की शिक्षा और सामाजिक ढांचे पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

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