
‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ का हवाला, नारी गरिमा और बाल सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ ने अपनी ही 12 वर्षीय बेटी के साथ दुष्कर्म करने वाले पिता की अपील खारिज करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई ‘प्राकृतिक मृत्यु तक आजीवन कारावास’ की सजा को बरकरार रखा है। जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि बच्चों के यौन शोषण और नारी गरिमा के मामलों में किसी भी तरह की नरमी स्वीकार्य नहीं है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा- “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाए और पिता जैसा नैतिक मार्गदर्शक विश्वासघात करे, तो यह केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि समाज और संस्थागत विश्वास का घोर उल्लंघन है।
डीएनए रिपोर्ट से ऊपर पीड़िता की गवाही
आरोपी की ओर से यह दलील दी गई कि एफएसएल और डीएनए रिपोर्ट नेगेटिव है तथा पत्नी ने तलाक के उद्देश्य से झूठा मामला दर्ज कराया। हाईकोर्ट ने इन तर्कों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि पीड़िता की गवाही स्वाभाविक, सुसंगत और विश्वसनीय है। केवल डीएनए रिपोर्ट नेगेटिव आने या एफआईआर में देरी से आरोपी को बरी नहीं किया जा सकता। साथ ही, 12 वर्षीय नाबालिग के मामले में ‘सहमति’ का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। घटना 12 अगस्त 2022 की है। रक्षाबंधन पर पीड़िता की मां के मायके जाने के दौरान आरोपी पिता ने घर में अकेली बेटी के साथ दुष्कर्म किया। मां के लौटने पर पीड़िता ने रोते हुए पूरी घटना बताई और पूर्व में भी बार-बार शोषण की बात कही। डूंगरपुर की पॉक्सो कोर्ट ने नवंबर 2022 में आरोपी को दोषी ठहराया था।
पीड़िता को 7 लाख रुपये मुआवजा
हाईकोर्ट ने पीड़िता के पुनर्वास को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार को ‘विक्टिम कंपनसेशन स्कीम–2018’ के तहत 7 लाख रुपये मुआवजा देने के निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में किसी भी तरह की नरमी न्याय व्यवस्था को कमजोर करेगी और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के संवैधानिक दायित्वों को विफल कर देगी।




