
दो में से एक ही बात सच हो सकती है– वह है, या तो राहुल गांधी को सवर्णों की चिंतनीय स्थिति नहीं मालूम, या फिर उनके भाषण के लेखक ने राहुल गांधी को बिहार में फंसा दिया है। बिहार में राहुल गांधी का कहना कि ब्राह्मण, राजपूत और भूमिहार प्रथम श्रेणी के नागरिक हैं। वे भूल गए कि बिहार के सवर्णों में एक और जाति होती है– कायस्थों की। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उसी कायस्थ बिरादरी के थे। यही नहीं, देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री भी उत्तर प्रदेश के कायस्थ परिवार के थे। राहुल गांधी को शायद पता नहीं होगा कि उनकी दादी इंदिरा गांधी के विरुद्ध आंदोलन का नेतृत्व करने वाले जयप्रकाश नारायण खुद कायस्थ थे। महात्मा गांधी जब अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध देश का नेतृत्व करने की इच्छा जाहिर किए तो तिलक ने उन्हें देश के लोगों की आर्थिक स्थिति का अध्ययन करने को कहा। बिहार के चंपारण जिले में गांधी ने देश की वास्तविक हालत देखी तो सूट-बूट त्यागकर एक धोती में आजीवन रह गए। बिहार वह भूमि है जहां गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ। महावीर का जन्मस्थल बिहार ही था। सम्राट चंद्रगुप्त और अशोक महान बिहार के मगध साम्राज्य के सम्राट थे। बिहार राजनीतिक प्रयोग की जन्मस्थली रही है। ज्ञान के क्षेत्र में भी बिहार का नालंदा विश्वविद्यालय में विदेश से लोग शिक्षा पाने आया करते थे, जिसे बख्तियार खिलजी ने जलाया था। राहुल गांधी अन्य पिछड़ी जातियों को समता दिलाने की बात करते हैं, जिसका कोई भी सवर्ण विरोध नहीं करता। लेकिन सवर्णों को प्रथम श्रेणी के नागरिक शायद सम्पन्नता के कारण कहा होगा, जो सच नहीं है। यह सही है कि बिहार में कहावत थी – “नदी नाले सरकार की, बाकी जमीन भूमिहार की।” लेकिन तब से अब तक भूमिहार, ब्राह्मण और राजपूतों की आर्थिक स्थिति बदतर हो चुकी है। राहुल गांधी को सर्वे करना चाहिए था। मिथिला के ब्राह्मण पाठक द्वारा देश-दुनिया में बनवाए सुलभ शौचालयों में जाकर देखें, सौ प्रतिशत उनमें सफाई कर्मी ब्राह्मण ही मिलेंगे। ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार देश भर में प्राइवेट सुरक्षा कर्मी के रूप में वॉचमैन ही करते मिल जाएंगे, या फिर प्राइवेट बिल्डिंगों, कल-कारखानों में पाँच-छह हजार पर नौकरी करने वाले युवा मिल जाएंगे। आज शिक्षा, बड़े बुजुर्गों की परिपत्ति, बेटी-बेटों के विवाह के लिए यही ऊँची जातियाँ पूरे देश में अपने खेत बेचते मिल जाएंगे। धनी परिवारों में भले आईएएस, प्रोफेसर, इंजीनियर और डॉक्टर, सेक्रेटरी मिल जाएंगे, लेकिन आम कथित ऊँची जातियों के ग्रेजुएट नौ हजार रुपए मासिक वेतन पर काम करते मिल जाएंगे। कथित सवर्णों की जमीन खरीदने वाले मौर्य, यादव, कुर्मी अधिक संख्या में मिल जाएंगे। यह सवर्णों का दुर्भाग्य है कि कथित सवर्ण – ब्राह्मण, क्षत्रिय, भूमिहार और कायस्थों की आर्थिक हालत विपन्नावस्था में पहुँच चुकी है। जो ऊँचे पदों पर पहुँचे हैं, उनकी संख्या सवर्ण आबादी की एक प्रतिशत भी नहीं होगी। इसलिए सवर्णों को प्रथम दर्जे का नागरिक बताकर सवर्णों की उपेक्षा ही नहीं, उपहास उड़ाया है, जिसे आत्मसम्मानी ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ कांग्रेस के विरुद्ध हो गए हैं। जबकि पचास-साठ वर्षों तक यही ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ बीजेपी के साथ जाकर सत्ता तक पहुँचाए थे। राहुल गांधी के बयान से ये कथित सवर्ण जातियों का झुकाव प्रशांत किशोर की तरफ हो चुका है, जो बिहार की राजनीति को पूरी तरह प्रभावित करेंगे। राहुल गांधी ने सवर्णों को प्रथम श्रेणी का नागरिक बताया, जिससे लगता है भाषण लिखने वाले ने राहुल गांधी को सच नहीं बताया। दुर्भाग्य है कि भारत सरकार और सुप्रीम कोर्ट सवर्णों की आर्थिक दैन्यता की अनदेखी करके उन्हें धनी बताया, यानी उन्हें गरीब नहीं समझा गया। देश के मंदिरों में पुजारी प्रायः ब्राह्मण ही हैं, जिन्हें सौ रुपया प्रति दिन वेतन दिया जाता है। ऐसी स्थिति में जब देश में कथित पिछड़ी जातियाँ ब्राह्मण विरोधी अभियान चला रही हैं, ब्राह्मणों को विदेशी बताने का षड्यंत्र किया जा रहा है। यह भुला दिया गया कि गौतम बुद्ध ने सारनाथ में अपना प्रथम उपदेश पाँच ब्राह्मणों को दिया था और अंतिम उपदेश भी एक सौ दो साल के बुजुर्ग ब्राह्मण को दिया था। जो ब्राह्मण बुद्ध के जन्म से पूर्व रहे हों, उन्हें विदेशी बताना न्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता। अगर ब्राह्मण उच्च पदों पर पहुँचा है, तो अपनी मेधा के बूते, किसी आरक्षण की बैसाखी के सहारे नहीं। ब्राह्मणों को विदेशी अंग्रेजों ने “फूट डालो, राज करो” की नीति के चलते बताया था। अंग्रेज जानते थे कि ब्राह्मणों में मेधा शक्ति प्रचंड होती है। अगर ब्राह्मणों को विदेशी बता दिया जाए, तो ब्राह्मणों के प्रति अन्य जातियों में वैमनस्य का भाव फैलाने से जनांदोलन को कमजोर किया जा सकता है। इसी लिए ब्राह्मण विरोधी अभियान अंग्रेजों ने चलाया, लेकिन “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” कहकर तिलक ने बता दिया – अंग्रेजों, तुम चाहे जितने कुचक्र रचो, ब्राह्मण तुम्हारे विरोध से पीछे नहीं हटेंगे। ब्राह्मण तो अंग्रेज अफसर को गोली मारने वाले मंगल पांडे ने बता दिया – तुम्हारी कूटनीति के चलते देश को मार्गदर्शन देने वाले ब्राह्मण पीछे नहीं हटेंगे। ब्राह्मण वीर भी होते हैं। मुगल बादशाह अकबर ने भी कुबूल किया था – ब्राह्मणों का लोहा मानते हुए अकबर ने कहा था कि युद्धभूमि में ब्राह्मणों को हराना नामुमकिन है। यह बात पूना के शासक ब्राह्मण पेशवा ने प्रमाणित कर दिखाया था। राहुल गांधी ने अज्ञानतावश बिहार में जो भाषण दिया था, उसी में कांग्रेस फंसकर रह गई है। इसका दुष्परिणाम कांग्रेस को बिहार विधानसभा में कांग्रेस की हार के रूप में आएगा। राहुल गांधी को देश में वर्तमान मुख्यमंत्री और मंत्रियों की जानकारी लेनी चाहिए कि उनमें कितने ब्राह्मण हैं। खुद प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और मुख्यमंत्रियों में कितने प्रतिशत ब्राह्मण हैं? बिना जानकारी के भाषण देने का अर्थ है – अपना पैर आप ही कुल्हाड़ी पर दे मारना।




