
देहरादून। देशभर में बिक रही दवाइयों की गुणवत्ता पर केंद्रीय दवा मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) की निगरानी के बीच उत्तराखंड की फार्मा कंपनियों की साख पर सवाल उठने लगे हैं। जनवरी 2025 से मई 2025 के बीच किए गए परीक्षणों में राज्य में निर्मित 112 दवाएं मानकों पर फेल पाई गई हैं, जिससे न केवल इन कंपनियों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया है, बल्कि राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग और निरीक्षण प्रणाली की कार्यप्रणाली भी कठघरे में आ गई है। उत्तराखंड में कुल 285 फार्मा कंपनियां कार्यरत हैं, जिनमें से 242 कंपनियां विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से प्रमाणित हैं। ये कंपनियां पिछले एक दशक से अधिक समय से देश की कई प्रतिष्ठित ब्रांडेड कंपनियों की दवाओं का उत्पादन कर रही हैं। राज्य के औद्योगिक परिदृश्य में इन फार्मा इकाइयों का अहम स्थान है, क्योंकि ये प्रत्यक्ष रूप से एक लाख से अधिक लोगों को रोजगार और अप्रत्यक्ष रूप से दो लाख से अधिक लोगों को आजीविका उपलब्ध कराती हैं। उत्तराखंड देश में कुल दवा उत्पादन का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा अकेले प्रदान करता है और यहां की दवाएं भारत के 15 से अधिक राज्यों और 20 से अधिक देशों को निर्यात की जाती हैं। ऐसे में गुणवत्ता को लेकर लगातार सामने आ रही असफलताएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की फार्मास्युटिकल छवि को नुकसान पहुंचा सकती हैं। CDSCO द्वारा लिए गए सैंपलों की जांच स्टेट और सेंट्रल लैबोरेट्री में की जाती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह कोई सामान्य चूक नहीं, बल्कि व्यवस्थित निगरानी की कमी और उत्पादन मानकों में ढिलाई का मामला है। इस पूरी स्थिति ने उत्तराखंड सरकार के स्वास्थ्य विभाग, औषधि निरीक्षण तंत्र और उद्योग मंत्रालय पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर इतने बड़े स्तर पर मानकों के उल्लंघन को कैसे अनदेखा किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द सख्त निरीक्षण, नियंत्रण और दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई, तो उत्तराखंड की फार्मा हब की पहचान को गहरा आघात पहुंच सकता है।




