Thursday, February 5, 2026
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पंजाब भाजपा: गुटबाज़ी में उलझी सियासत की नई राह

सुभाष आनंद
पंजाब में भारतीय जनता पार्टी 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुटी हुई है। पार्टी के नेताओं द्वारा बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। भाजपा पंजाब में कई गुटों में बंटी हुई है, जिससे पार्टी की स्थिति कमजोर होती जा रही है। यहां सबसे बड़ा और शक्तिशाली गुट अश्विनी शर्मा का माना जा रहा है, जो प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष हैं। दूसरा गुट सुनील जाखड़ का है, जो केंद्रीय स्तर पर प्रभावशाली है और आम आदमी पार्टी की आलोचना करने में सक्रिय है। तीसरा गुट संघ का है, जिसका अपना प्रभाव और अपनी अलग राजनीति है। पंजाब भाजपा में गुटबाजी के कई कारण हैं। एक प्रमुख कारण बाहरी नेताओं का पार्टी में शामिल होना भी है। इससे पुराने भाजपा नेताओं में बेचैनी बढ़ गई है, क्योंकि पार्टी नए लोगों को प्राथमिकता दे रही है और पुराने कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है। पुराने नेता इस बात से चिंतित हैं कि कहीं उनकी टिकट काटकर बाहरी लोगों को न दे दी जाए। इसके अलावा, जिला स्तर पर भी पार्टी कई गुटों में बंटी हुई है, जिससे पार्टी का आधार कमजोर हो रहा है। पंजाब में अकाली दल और भाजपा के बीच गठबंधन की संभावना पर भी चर्चा हो रही है। कैप्टन अमरिंदर सिंह और सुनील जाखड़ जैसे नेता कह रहे हैं कि भाजपा को सत्ता में आने के लिए क्षेत्रीय पार्टी (अकाली दल) से समझौता करना होगा। हालांकि, अकाली दल इस बात पर राजी नहीं है कि भाजपा बड़े भाई की भूमिका निभाए। पंथक वोट फिर से अकाली दल की ओर जा रहे हैं, जिससे भाजपा के लिए यह गठबंधन मुश्किल हो सकता है। पंजाब में भाजपा को कई चुनावी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उपचुनावों में हार के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि गांवों में भी भाजपा का आधार खिसक रहा है। नए शामिल हुए नेताओं की छवि भी अच्छी नहीं है, जिससे लोगों में भाजपा के प्रति आदर्शों की कमी महसूस की जा रही है। कांग्रेस से भाजपा में आए नेताओं की स्थिति भी विचित्र है, क्योंकि स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता उन्हें पसंद नहीं कर रहे हैं और चुनावों में विरोध का सामना करना पड़ सकता है। भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष अश्विनी शर्मा ने कहा है कि पार्टी 2027 के चुनावों में अकेले अपने बल पर चुनाव लड़ेगी। उन्होंने यह भी कहा है कि भाजपा की राजनीति कोठियों में नहीं चलती, बल्कि लोगों से संपर्क बनाने के लिए फील्ड में आना पड़ता है। भाजपा चुनाव पूर्व अंतिम समय में माहौल बनाने में माहिर है, लेकिन कार्यकर्ताओं और नेताओं की नाराजगी को दूर करना एक बड़ी चुनौती है। पंजाब में भाजपा 2027 के चुनावों से पहले कई चुनौतियों का सामना कर रही है। गुटबाजी, बाहरी नेताओं का प्रवेश, और अकाली दल से गठबंधन की अनिश्चितता पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही हैं।
यदि भाजपा हाईकमान समय पर कार्रवाई नहीं करता, तो पार्टी की स्थिति कांग्रेस से भी बदतर हो सकती है। पार्टी को अपने पुराने कार्यकर्ताओं को विश्वास में लेना होगा और नए नेताओं के साथ संतुलन बनाना होगा। साथ ही, अकाली दल के साथ गठबंधन पर विचार करना होगा, ताकि 2027 के चुनावों में बेहतर प्रदर्शन किया जा सके। पंजाब की राजनीति में भाजपा को अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए जमीनी स्तर पर काम करना होगा और कार्यकर्ताओं की नाराजगी को दूर करना होगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा 2027 के चुनावों में कैसी रणनीति अपनाती है और क्या वह पंजाब में अपनी खोई हुई जमीन वापस पा सकती है।

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