
मुंबई। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को पारंपरिक चिकित्सीय ढांचे से आगे ले जाकर सामुदायिक आधारित, सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील और सहयोगात्मक मॉडल विकसित करने की आवश्यकता पर विशेषज्ञों ने जोर दिया। शुक्रवार को पल्स 2026 कॉन्फ्रेंस के अंतर्गत जियो वर्ल्ड कन्वेन्शन सेंटर में आयोजित सत्र में डॉ.हमीद दाभोलकर, राज मरीवाला और रत्नाबोली रॉय ने भाग लिया, जबकि चर्चा का संचालन प्राजक्ता कोली ने किया। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि मानसिक स्वास्थ्य केवल डॉक्टर और मरीज के बीच का विषय नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज से जुड़ा हुआ मुद्दा है। डॉ. दाभोलकर ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों और विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अलग-अलग मान्यताएं होती हैं, इसलिए सेवाएं प्रदान करते समय स्थानीय संस्कृति के अनुरूप दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। उन्होंने यह भी बताया कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सीमित संख्या को देखते हुए सामुदायिक स्तर पर व्यवस्था विकसित करना जरूरी है, जिसमें आशा कार्यकर्ता, स्वयंसेवी संस्थाएं और स्थानीय प्रतिनिधि महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। रत्नाबोली रॉय ने मानसिक स्वास्थ्य पुनर्वास के सामाजिक पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि लंबे समय तक संस्थानों में रहने के बाद व्यक्ति को समाज में पुनः स्थापित होना चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में पहचान, आजीविका और सम्मान जैसे मुद्दे सामने आते हैं। उन्होंने कहा कि पुनर्वास केवल उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति के आत्मसम्मान और सामाजिक पुनर्स्थापन से भी जुड़ा है। राज मरीवाला ने मानसिक स्वास्थ्य के सामाजिक कारणों पर जोर देते हुए कहा कि केवल अवसाद और चिंता जैसे निदानों पर ध्यान केंद्रित करना पर्याप्त नहीं है। भारत में आत्महत्या के कई मामलों के पीछे सामाजिक कारण होते हैं, इसलिए इस विषय को व्यापक सामाजिक संदर्भ में समझना आवश्यक है। उन्होंने स्वयंसेवी संस्थाओं, वित्तीय सहायता देने वाली संस्थाओं और नीति-निर्माताओं से दीर्घकालिक, समावेशी और समुदाय-आधारित पहल को समर्थन देने का आह्वान किया, साथ ही युवाओं से जागरूकता बढ़ाने और एक-दूसरे की मदद करने की अपील भी की।




