
उन्नाव, उत्तर प्रदेश। उन्नाव की वह बेटी आज भी अकेली खड़ी है- आँखों में आँसू कम और व्यवस्था से सवाल ज़्यादा। दिसंबर की कड़ाके की ठंड में, जब राजधानी की सड़कों पर लोग कोहरे से बचने के लिए घरों में दुबके हैं, तब एक माँ और उसकी बेटी न्याय की उस मशाल को थामे खड़ी हैं, जो बुझने की कगार पर है। उत्तर प्रदेश के बहुचर्चित उन्नाव कांड में दिल्ली हाईकोर्ट का ताज़ा फैसला—दोषी कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सजा पर रोक और जमानत- न सिर्फ पीड़िता के लिए, बल्कि देश की हर उस महिला के लिए गहरा झटका है, जो कानून की किताब पर भरोसा करती है। यह फैसला एक बार फिर सवाल खड़े करता है कि क्या न्याय की राह रसूख और प्रभाव के आगे कमजोर पड़ जाती है। पीड़िता के साथ आज गिनती के लोग ही खड़े दिखते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना की मौजूदगी इस संघर्ष का प्रतीक है, लेकिन यह भी कटु सत्य है कि 140 करोड़ की आबादी वाले देश में ‘बेटी बचाओ’ का नारा अक्सर चुनावी मंचों तक सीमित रह जाता है। जब किसी प्रभावशाली अपराधी को राहत मिलती है, तब समाज का बड़ा हिस्सा खामोशी क्यों ओढ़ लेता है? छोटी-छोटी घटनाओं पर मोमबत्तियाँ जलाने वाली भीड़ ऐसे मामलों में ग़ायब क्यों हो जाती है, जहाँ सवाल सत्ता और रसूख से टकराते हैं? क्या हमारी संवेदनाएँ अब विचारधाराओं और राजनीतिक सुविधाओं की बंधक बन चुकी हैं? न्याय व्यवस्था को लेकर बढ़ता अविश्वास भी इसी खामोशी से जन्म लेता है। एक ओर कुछ मामलों में अदालतें सरकार की मनमानी पर रोक लगाकर उम्मीद जगाती हैं, तो दूसरी ओर उन्नाव जैसे मामलों में मिली राहतें न्याय की गति और निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। वर्षों तक धमकियाँ, परिवार का उजड़ना और घर छोड़ने की मजबूरी झेलने के बाद जब किसी पीड़िता को सजा का भरोसा मिलता है और फिर वही दोषी बाहर आता दिखता है, तो कानून की साख पर गहरी चोट पड़ती है। यह ढील सिर्फ एक मामले तक सीमित नहीं रहती; यह उस मानसिकता को पोषण देती है जो महिलाओं को दूसरे दर्जे का नागरिक समझती है। आज किसी और की बेटी की चीख को अनसुना करना कल पूरे समाज के लिए ज़हर बन सकता है। खामोशी कभी समाधान नहीं रही। यह समय आत्ममंथन का है—क्या हम ऐसा समाज चाहते हैं जहाँ न्याय केवल धनवानों और बाहुबलियों की जागीर हो, या वह भारत जहाँ एक अकेली लड़की भी व्यवस्था की आँखों में आँखें डालकर अपने हक की लड़ाई लड़ सके? उन्नाव की बेटी की लड़ाई सिर्फ उसकी नहीं है। यह संघर्ष संविधान, मानवीय गरिमा और उस भरोसे की रक्षा का है, जो एक आम नागरिक अदालत से रखता है। उठिए—इससे पहले कि व्यवस्था की यह ठंड हमारी संवेदनाओं को पूरी तरह सुन्न कर दे। न्याय की लड़ाई में हाथ से हाथ जोड़ना ही अब एकमात्र रास्ता है।




