
अनिल बेदाग
मुंबई। भारतीय सिनेमा में ‘कपूर’ एक ऐसा सरनेम है, जो दशकों से विरासत, प्रतिष्ठा और पहचान का प्रतीक रहा है। लेकिन आज इसी नाम को काशिका कपूर अपनी मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास के ज़रिये एक नया अर्थ दे रही हैं। काशिका स्पष्ट शब्दों में कहती हैं, “मेरे नाम में ‘कपूर’ कभी कोई चुनाव नहीं था। यह मेरा जन्म का नाम है, जो मुझे मेरी माँ से मिला है। इसमें कुछ भी गढ़ा हुआ नहीं था। उनके लिए यह सरनेम किसी चर्चा या धारणा का विषय नहीं, बल्कि एक निजी और भावनात्मक पहचान है। वह आगे जोड़ती हैं, यह नाम मेरी माँ की ताकत, उनके संस्कार और उनके आशीर्वाद को अपने भीतर समेटे हुए है। मैं इन्हीं मूल्यों के साथ आगे बढ़ती हूँ।” जहाँ अक्सर किसी सरनेम को फ़िल्मी विरासत और बैकग्राउंड से जोड़कर देखा जाता है, वहीं काशिका कपूर की यात्रा पूरी तरह आत्मनिर्मित रही है। अनुशासन, धैर्य और निरंतर सीखने की प्रक्रिया ने उनके सफ़र को आकार दिया है।
“मेरा सफ़र पूरी तरह मेरा अपना रहा है। मैं स्वनिर्मित हूँ और इस पर मुझे गहरा गर्व है,” वह आत्मविश्वास के साथ कहती हैं। आज काशिका कपूर अलग-अलग भाषाओं और फ़िल्म इंडस्ट्रीज़ में अपने काम का विस्तार कर रही हैं। उनका फोकस सफ़ाई देने या तुलना में उलझने के बजाय विकास और निरंतर प्रगति पर है। उनके करियर के चुनाव सोच-समझकर किए गए हैं, उनकी गति स्थिर है और उनकी मौजूदगी पहले से कहीं अधिक परिपक्व और सशक्त दिखाई देती है। काशिका कहती हैं- मैं चाहती हूँ कि मुझे मेरे अभिनय और उन कहानियों के लिए जाना जाए जिन्हें मैं चुनती हूँ। नाम लोगों की जिज्ञासा ज़रूर बढ़ा सकते हैं, लेकिन लंबी दौड़ में टिकता वही है, जिसका काम मज़बूत होता है।आज के उस दौर में, जहाँ दृश्यता अक्सर सार से ज़्यादा शोर पैदा करती है, काशिका कपूर अपनी शालीनता, ज़मीन से जुड़े दृष्टिकोण और स्पष्ट सोच के कारण अलग नज़र आती हैं। उनका सफ़र यह याद दिलाता है कि पहचान जब आत्मविश्वास और मेहनत के साथ गढ़ी जाए, तो उसे बार-बार साबित करने की ज़रूरत नहीं होती—वह अपने आप कायम रहती है।




