
मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार, 21 जुलाई को 2006 के भयावह मुंबई लोकल ट्रेन बम धमाकों के मामले में सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया। यह फैसला 11 जुलाई 2006 को मुंबई की सात लोकल ट्रेनों में एक साथ हुए सिलसिलेवार बम विस्फोटों से जुड़ा है, जिनमें 189 लोगों की जान गई थी और 800 से अधिक यात्री घायल हुए थे। इस मामले में सितंबर 2015 में मकोका ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों को दोषी ठहराया था, जिसमें छह को मौत की सजा और सात को उम्रकैद दी गई थी। इनमें से एक आरोपी, कमाल अंसारी की नागपुर जेल में कोविड संक्रमण के दौरान मौत हो गई थी। हाईकोर्ट की दो सदस्यीय पीठ- न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति एस.एम.चांडक ने ट्रायल कोर्ट के 30 सितंबर 2015 के फैसले को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि दोषसिद्धि को बनाए रखने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि बम धमाकों में किस प्रकार के विस्फोटक का प्रयोग हुआ था। कथित स्वीकारोक्ति बयान कानूनी परीक्षण पर खरे नहीं उतरे, आरोपियों को कथित तौर पर बयान से पहले यातना दिए जाने के दावों को अदालत ने विश्वसनीय माना। साथ ही अदालत ने पहचान परेड को “प्राधिकृत अधिकारियों की स्वीकृति के अभाव” में अवैध ठहराया और अभियोजन पक्ष के मुख्य गवाहों के बयानों को भी अविश्वसनीय मानते हुए खारिज कर दिया। इससे पहले, हाईकोर्ट ने 31 जनवरी 2024 को सात महीने लंबी सुनवाई के बाद सभी 12 दोषियों की अपील और पांच की मौत की सजा की पुष्टि को लेकर अपना फैसला सुरक्षित रखा था। भारत के आपराधिक कानून के अनुसार, ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई मौत की सजा को तब तक निष्पादन योग्य नहीं माना जाता जब तक उसे हाईकोर्ट द्वारा पुष्टि न दी जाए। इस संदर्भ में हाईकोर्ट का निर्णय सभी आरोपियों के लिए निर्णायक साबित हुआ। जिन छह लोगों को बम लगाने का दोषी ठहराया गया था और मौत की सजा सुनाई गई थी, उनमें कमाल अंसारी (मृतक), मोहम्मद फैसल, अताउर रहमान शेख, एहतेशाम कुतुबुद्दीन सिद्दीकी, नवीद हुसैन खान और आसिफ खान शामिल थे। इसके अलावा सात अन्य आरोपियों — तनवीर अहमद अंसारी, मोहम्मद मजीद शफी, शेख मोहम्मद अली आलम, मोहम्मद साजिद मरगूब अंसारी, मुज़म्मिल अताउर रहमान शेख, सुहैल महमूद शेख और ज़मीर अहमद लतीफुर रहमान शेख को भी ट्रायल कोर्ट ने दोषी माना था, जिन्हें अब हाईकोर्ट ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। यह मामला 2006 के उस आतंकवादी हमले से जुड़ा है, जब शाम 6:30 बजे के आसपास मुंबई की उपनगरीय लोकल ट्रेनों में माटुंगा, माहिम, बांद्रा, जोगेश्वरी, बोरीवली, कांदिवली और मीरा रोड स्टेशनों पर एक के बाद एक सात विस्फोट हुए थे। भीड़-भाड़ वाले समय को निशाना बनाकर अधिकतम जनहानि करने की मंशा जाहिर की गई थी। प्रारंभिक जांच में इन हमलों के पीछे लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) का हाथ बताया गया था।
हाईकोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में जांच और अभियोजन की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, विशेष रूप से ऐसे मामलों में जहां वर्षों तक निर्दोष लोग जेल में रहते हैं और बाद में सबूतों के अभाव में बरी कर दिए जाते हैं।




