
विवेक रंजन श्रीवास्तव
प्राचीन काल के युद्धों की स्मृति मात्र ही हमें एक ऐसे युग में ले जाती है जहाँ शस्त्रों का स्वरूप प्राकृतिक और सीमित था। पुराने समय के धनुष बाण से लड़े जाने वाले युद्ध एक प्रकार से इको फ्रेंडली कहे जा सकते थे क्योंकि उनमें प्रयुक्त सामग्री सीधे तौर पर प्रकृति से आती थी और पुन: उसी में विलीन हो जाती थी। उस दौर में न तो जहरीली गैसों का उत्सर्जन होता था और न ही मिट्टी की उर्वरता को सदा के लिए नष्ट करने वाले घातक रसायनों का प्रयोग किया जाता था। एक योद्धा के तरकश से निकला बाण केवल लक्ष्य को भेदता था। आज की मिसाइलें पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को ही छलनी कर देती हैं। समय के साथ मनुष्य की विध्वंसक शक्ति बढ़ती गई और हम लकड़ी के बाणों से निकलकर बारूदी विनाश के उस भयावह युग में आ गए हैं जहाँ जीत का जश्न मनाने के लिए न तो स्वच्छ वायु बचती है और न ही रहने योग्य भूमि। आज की बारूदी मिसाइलों और आधुनिक हथियारों से पर्यावरण को जो अपूरणीय क्षति हो रही है वह किसी भी राजनीतिक विजय से कहीं अधिक महंगी है। जब कोई मिसाइल दागी जाती है तो वह केवल जीवन ही नहीं लेती बल्कि वातावरण में भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और सल्फ्यूरिक एसिड जैसे हानिकारक तत्व घोल देती है। युद्ध क्षेत्रों में होने वाले विस्फोटों से निकलने वाला सूक्ष्म गर्द और जहरीला धुआं मीलों दूर तक फैलकर लोगों के फेफड़ों में जहर भर रहा है। बमबारी से होने वाले कंपन और रसायनों के रिसाव के कारण भूजल स्तर न केवल दूषित हो रहा है बल्कि मिट्टी अपनी पैदावार की क्षमता भी खो रही है। यह विनाश केवल वर्तमान तक सीमित नहीं है अपितु आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा बंजर संसार विरासत में दे रहा है जहाँ सांस लेना भी एक संघर्ष होगा। युद्ध की विभीषिका थमने के बाद नव निर्माण की चुनौती एक अलग ही आर्थिक और पर्यावरणीय संकट खड़ा करती है। हाल ही में गाजा के नव निर्माण हेतु डोनाल्ड ट्रंप द्वारा एक विशेष समूह के गठन की चर्चा इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है कि युद्ध के बाद खंडहरों को फिर से बसाने में कितनी ऊर्जा और धन का व्यय करना पड़ता है। शोध बताते हैं कि युद्ध के बाद मलबे को हटाने और नई इमारतों के निर्माण में लगने वाला सीमेंट और कंक्रीट उद्योग वैश्विक स्तर पर भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन करता है। जो संसाधन शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च होने चाहिए थे वे युद्ध द्वारा फैलाई गई गंदगी को साफ करने और ईंट पत्थर जोड़ने में बर्बाद हो रहे हैं। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसमें पहले हम अरबों डॉलर खर्च करके विनाश करते हैं और फिर उसी विनाश को ढंकने के लिए दोबारा अरबों डॉलर का निवेश करते हैं। पर्यावरण पर युद्ध के प्रभाव को केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित मान लेना हमारी सबसे बड़ी भूल है। समुद्रों में गिरने वाली मिसाइलें और जलमग्न होते जहाज समुद्री जीव जंतुओं के आवास को नष्ट कर रहे हैं जिससे पूरी खाद्य श्रृंखला प्रभावित हो रही है। जंगलों में लगने वाली आग और जैव विविधता का ह्रास हमें उस बिंदु पर ले आया है जहाँ से वापसी संभव नहीं दिखती। यदि मानवता को जीवित रहना है तो हमें युद्ध की परिभाषा को बदलना होगा और समझना होगा कि प्रकृति की हार में मनुष्य की जीत कभी नहीं छिपी हो सकती। हमें हथियारों की इस अंधी दौड़ को रोककर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सोचना होगा ताकि भविष्य का मनुष्य केवल इतिहास के पन्नों में ही नहीं बल्कि एक स्वस्थ धरा पर जीवित रह सके। काश कि आज के हठ धर्मी नेता जो मानवता पर ये युद्ध थोप रहे हैं, अशोक के सदृश होते , तो बुद्ध पुनः बातों से निकल कर जीवन में प्रवेश कर पाते (लेखक युद्ध के कारण लंदन में रुके हुए)




