Tuesday, January 13, 2026
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आर्थिक सौदेबाज़ी का माध्यम बनती विवाह संस्था

शिवम् मिश्रा
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के एक अत्यंत संवेदनशील और झकझोर देने वाले निर्णय में एक 20 वर्षीय नवविवाहिता की मृत्यु के संदर्भ में टिप्पणी की है कि “वह अपने ससुराल पक्ष के लिए केवल एक रंगीन दूरदर्शन, एक मोटरसाइकिल और 15,000 रुपए के समतुल्य मूल्य की थी।” तथा दहेज को ऐसी क्रॉस-कल्चरल सामाजिक बुराई कहा गया जो अब उपहारों और सामाजिक अपेक्षाओं की आड़ में विधिक परिभाषाओं से फिसल जाती है, यह प्रकरण मात्र एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि उस संरचनात्मक हिंसा का द्योतक है जो भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक संरचना में गहराई से अंतर्निहित है, जहाँ विवाह एक भावनात्मक-सामाजिक संस्था न रहकर आर्थिक सौदेबाज़ी का माध्यम बन चुका है और स्त्री को चल संपत्ति के रूप में आँका जाने लगा है। मार्क्स के वस्तुकरण सिद्धांत के साथ-साथ यहाँ आंद्रे बेतेई के वर्ग और असमानता संबंधी विश्लेषण को भी स्मरण करना आवश्यक है, जिन्होंने बताया कि आधुनिक भारत में वर्गीय प्रतिस्पर्धा और मध्यवर्गीय आकांक्षाओं ने विवाह को सामाजिक गतिशीलता का साधन बना दिया है। वेबर के ‘स्टेटस ग्रुप’ सिद्धांत की भाँति एम.एन.श्रीनिवास की संस्कृतिकरण की अवधारणा यह स्पष्ट करती है कि निम्न एवं मध्य जातियाँ उच्च जातियों की विवाह-प्रथाओं विशेषतः दहेज की नकल कर सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करना चाहती हैं, जिसके परिणामस्वरूप यह कुप्रथा और अधिक व्यापक होती चली जाती है, जबकि दुर्खीम की एनोमी की अवधारणा को टी.एन. मदन की परंपरा और आधुनिकता की बहस के साथ जोड़कर देखें तो यह समझ में आता है कि उपभोक्तावाद और नैतिक दिशाहीनता ने विवाह संस्था को मूल्यहीन बना दिया है। नारीवादी दृष्टिकोण से दहेज मृत्यु घरेलू हिंसा का वह चरम रूप है जिसमें स्त्री की देह, श्रम और उत्तराधिकार पर पितृसत्ता का पूर्ण वर्चस्व स्थापित हो जाता है,और यहाँ लीला दुबे तथा मैत्रेयी चौधरी जैसे भारतीय समाजशास्त्रियों का कार्य उल्लेखनीय है, जिन्होंने विवाह और परिवार को स्त्री-अधीनता की प्रमुख संरचनाएँ बताया है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह रेखांकित किया जाना कि मुस्लिम समाज में भी मेहर के स्थान पर दहेज की प्रवृत्ति बढ़ रही है, इस तथ्य को उजागर करता है कि यह सामाजिक विकृति अब जाति, वर्ग और धर्म की सीमाओं से परे फैल चुकी है तथा स्त्रियों की आर्थिक स्वायत्तता को गंभीर रूप से क्षीण कर रही है। यह वही स्थिति है जिसे बी.आर. अम्बेडकर ने विवाह में स्त्री की समानता के अभाव के रूप में चिन्हित किया था; भारतीय दंड संहिता की धारा 304बी, 498एतथा दहेज निषेध अधिनियम, 1961 जैसे सुदृढ़ कानूनी प्रावधानों के बावजूद एनसीआरबी के रुझान यह संकेत देते हैं कि सामाजिक चुप्पी, बदनामी का भय, समझौता-संस्कृति, पंचायत या पारिवारिक दबाव और पुलिस-प्रशासन की उदासीनता के कारण दहेज मृत्यु के अधिकांश प्रकरण दर्ज ही नहीं हो पाते, जिसके परिणामस्वरूप पीड़िता के साथ-साथ उसका मायका भी अपराधबोध, ऋणग्रस्तता और सामाजिक अपमान का बोझ ढोता है तथा बच्चे इस हिंसा को सामान्य मानकर आगे की पीढ़ियों तक उसका पुनरुत्पादन करते हैं। जिसे समाजशास्त्र में पीढ़ीगत हिंसा का संचरण कहा जाता है। ऐसे परिप्रेक्ष्य में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पाठ्यक्रमों में विवाह को संवैधानिक समानता और पारस्परिक सम्मान के मूल्यों पर आधारित करने, दहेज निषेध अधिकारियों की शीघ्र नियुक्ति एवं उनके विवरण सार्वजनिक करने तथा पुलिस एवं न्यायिक अधिकारियों के नियमित प्रशिक्षण और संवेदनशीलता कार्यक्रमों के निर्देश अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि दहेज के विरुद्ध संघर्ष केवल विधिक हस्तक्षेप का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के पुनर्निर्माण की अनिवार्यता हैऔर जब तक विवाह एक बाज़ार तथा स्त्री एक मोल-भाव योग्य वस्तु के रूप में देखी जाती रहेगी, तब तक दहेज मृत्यु भारतीय समाज की सामूहिक नैतिक विफलता का सबसे क्रूर प्रतीक बनी रहेगी।

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