Wednesday, March 11, 2026
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सर्वव्यापी है भगवान शिव की भक्ति और शक्ति

मुकेश “कबीर”
भगवान शिव भारतीयता के सबसे बड़े प्रतीक हैं खासकर भारतीय विचारधारा के आधार वाक्य “सादा जीवन उच्च विचार” के अनुसार जीवन जीने वाले हैं भगवान शिव। यही कारण है कि प्राचीन भारत में सबसे ज्यादा पूजे जाने वाले देव रहे हैं शिव। शिव की भक्ति और शक्ति कितनी व्यापक स्तर पर रही होगी इसका अंदाज हम इस बात से लगा सकते हैं कि पृथ्वी के हर भाग में शिव की प्रतिमाएं मिलती हैं।यदि किसी कारण से उन भागों पर सनातन के अलावा किसी अन्य संस्कृति ने कब्जा कर लिया तो भी वहां खुदाई में शिव प्रतिमा प्रकट हो जाती है । चाहे कट्टर इस्लामिक देश ही क्यों न हों जहां बुतपरस्ती हराम है वहां भी खुदाई में भगवान शिव की प्रतिमाएं प्रकट हो आती हैं। इसका अर्थ यह है कि सारी दुनिया शिव की उपासक रही है। भारत में तो एक विचार यह भी है कि मक्का में हज यात्रा के दौरान जिस मूर्ति को चूमकर पूजा जाता है ,जिसे हिज़्र ए अस्वत कहा जाता है वह पवित्र मूर्ति भी शिवलिंग ही है। भविष्यपुराण में भी इसका जिक्र है जहां इसका उल्लेख मक्केश्वर महादेव के रूप में किया गया है। यदि हम हिज़्र ए अस्वत को शिवलिंग न भी मानें तो भी कई अरब देशों में जमीन से शिवलिंग प्रकट हुए हैं। सिर्फ मुस्लिम देश ही नहीं बल्कि अमेरिका और यूरोप में भी ऐसे कई प्रमाण मिले हैं जिन्हें गूगल सर्च में भी हम देख सकते हैं। और यदि एशिया की बात करें तो यह तो जैसे भगवान शिव का घर ही है। यहां तो चीन, कोरिया ,लंका जैसे देशों में सिर्फ शिवलिंग की मौजूदगी ही नहीं है बल्कि उनके भक्त भी मिल जाते हैं ।आज भी,चीन में कैलाश मानसरोवर तो विश्व विख्यात है। भारत में तो शिवजी के बारे में कुछ कहने की जरूरत ही नहीं यहां तो उनकी महिमा स्वयं सिद्ध है,शिव के बिना हम भारत की कल्पना भी नहीं कर सकते,यहां तो उनके आदर्श वाक्य सादा जीवन उच्च विचार की सदियों पुरानी परम्परा रही है और आज भी हमारा यही सिद्धांत है। भले ही आज भारत का पश्चिमीकरण हो रहा है लेकिन फिर भी हमारी जीवन शैली शिव से ही प्रभावित है क्योंकि हमारी पूरी संस्कृति शिव की ही देन है। खासकर हमारे संगीत, नृत्य,वादन और अभिनय के प्रणेता तो शिव ही हैं,इसीलिए उन्हें नटराज कहा गया। शास्त्रीय संगीत की मान्यताओं के अनुसार हमारे संगीत का जन्म ही शिव जी के डमरू से हुआ है इसलिए संगीत में उनको आदिदेव माना गया है। श्रीकृष्ण से पहले शिव ही संगीत के आराध्य देव थे। सारी बंदिशें ही शिव केंद्रित ही थीं बाद में श्रीकृष्ण का प्रवेश हुआ। खासकर जब ब्रजभाषा और ब्रज साहित्य का प्रभाव बढ़ा और सूरदास जैसे महाकवियों ने साहित्य रचा तो श्रीकृष्ण आराध्य के रूप में प्रकट हुए। वैसे पौराणिक काल में खासकर देव भाषा संस्कृत में शिव का महिमा गान ही ज्यादा मिलता है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि शिव सबके आराध्य हैं फिर चाहे श्रीराम हों या रावण। शिव दरबार में मनुष्य,राक्षस,देव,गंधर्व, किन्नर में कोई भेद नहीं सभी उनके उपासक हैं क्योंकि शिव जी बहुत ही सहजता से प्रसन्न हो जाते हैं। वे सिर्फ भाव से ही प्रकट हो जाते हैं इसलिए चारों वर्ण में पूजे गए। उन्हें प्रसन्न करने के लिए बहुत ज्यादा औपचारिकताओं की और मर्यादाओं की जरूरत नहीं इसलिए राक्षसों ने भी शिव जी को ही प्रसन्न किया और आज भी शिव इतने सहज हैं कि सिर्फ एक लोटा जल चढ़ाने से ही प्रसन्न हो जाते हैं इसलिए जहां वैष्णव संप्रदाय में भव्य पूजाओं का विधान मिलेगा वहीं शैव्य सम्प्रदाय में इतनी सहजता मिलेगी कि जो जहां है जैसा है वैसे ही शिव पूजन कर सकता है। इसके प्रमाण हमें शिवनगरी काशी में आज भी देखने को मिल जाते हैं जहां रास्ते चलते लोग भी शिव जी को जल चढ़ा देते हैं फिर कोई जरूरी नहीं आपने स्नान ककड़ी तिलक कंठी धारण की है या नहीं या आप ब्राह्मण हैं या नहीं और यह सिर्फ काशी ही नहीं सभी ज्योतिर्लिंगों में देखने को मिलता है सिर्फ रामेश्वरम को छोड़कर। रामेश्वरम में जरूर आपको बहुत से कुंडो का स्नान पहले कराया जाता है उसके बाद ही आप शिव के दर्शन करेंगे लेकिन उसके कारण अलग हैं। रामेश्वरम के शंकर भगवान राम के यानि एक राजा के या एक गृहस्थ के आराध्य हैं इसलिए वहां मर्यादाएं है लेकिन अन्य ज्योतिर्लिंग वनवासियों की भोली भक्ति से स्थापित हुए है इसलिए जो सहजताए हैं वे आज भी कायम हैं। वहां वे वन जीवन के अनुसार ही पूजे जाते रहे हैं। अब भले ही उन सब स्थानों का डेवलपमेंट हो चुका है इसलिए सांसारिकता दिखने लगी है लेकिन मूल स्वरूप आज भी वनवासी ही है क्योंकि शिव जी हैं ही बटुक बिहारी फिर आप उन्हें जल से पूजे, पत्ती से पूजे या धतूरे से उनके लिए सब समान है बस आपका प्रेम होना चाहिए। गीता में परमात्मा कहते हैं कि मुझे प्रेम से पत्ती और फूल भी स्वीकार है,यही स्वरूप हम शिव भक्ति में देख सकते हैं। भारत में ऐसे हजारों मंदिर भी मिल जायेंगे जिनकी स्थापना चोर और डाकुओं की अनायास भक्ति के कारण शिव जी के प्रकट और प्रसन्न होने से हुई। इस तरह के अनेक किस्से हम पुराणों में पढ़ सकते हैं। भारत में जंगल और पेड़ पौधे तो छोड़िए चट्टान और नदी में भी शिवलिंग मिल जाते हैं, हमारी नर्मदा नदी तो रोज ही लाखों शिवलिंग का निर्माण करती है और उनकी पूजा से भी शिव जी प्रसन्न हो जाते हैं इसलिए कहावत है “नर्मदा के कंकर सारे शंकर”। नर्मदा नदी में मार्बल और स्फटिक की चट्टानें बहुत हैं इसीलिए देश में स्फटिक और मार्बल के शिवलिंग बहुत पाए जाते हैं। इनमें कुछ मां नर्मदा ने निर्मित किए तो कुछ भक्तों ने लेकिन शिव जी को कोई फर्क नहीं पड़ता हर हाल में खुश। हमारे देश में ऐसे उदाहरण भी हैं जब शिवजी जी की कोई प्रतिमा नहीं मिली तो आम और जामुन को भी शिवलिंग समझकर भक्तों ने पूज दिया और शिव जी प्रसन्न हो गए। ओंकारेश्वर में तो आज भी मिट्टी के शिवलिंग बनाने की परंपरा है,भक्त लोग लाखों शिवलिंग रोज बनाते हैं और नर्मदा में विसर्जित करते हैं।इसी तरह श्रावण मास में भी मिट्टी के शिवलिंग बनाकर पूजने का भी विधान है। यह तो शिव की सगुण और सहज भक्ति के उदाहरण हैं लेकिन हम साहित्य और संगीत में उनकी निर्गुण भक्ति भी देखें तो शास्त्रीय संगीत में हजारों बंदिशे और परन मिलेंगी जो शिव को समर्पित हैं इन बंदिशों में उन्हें आदिदेव कहा गया है। प्राचीन संगीत के एकमात्र आराध्य हैं “शंकर आदिदेव योगी महादेव”।

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