
मुंबई। महाराष्ट्र में 29 महानगर पालिकाओं के चुनाव की घोषणा के साथ ही सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। चुनावी माहौल बनते ही कई नेता अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन तलाशने के लिए लगातार बयानबाजी कर रहे हैं और अपने आकाओं को खुश करने की कोशिशों में जुट गए हैं। इसी कड़ी में मीरा-भायंदर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे रहे भाजपा नेता कृपाशंकर सिंह का बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। कार्यक्रम के दौरान कृपाशंकर सिंह ने जनता से अपील करते हुए मीरा-भायंदर शहर के लिए एक उत्तर भारतीय मेयर बनाने का दावा किया। इस बयान के बाद सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या यह मांग वास्तव में उत्तर भारतीय समाज के हित में है या फिर चुनावी दौर में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की एक कोशिश मात्र है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कृपाशंकर सिंह ऐसे नेता रहे हैं जिन्हें उत्तर प्रदेश में ही उत्तर भारतीयों ने नकार दिया, लेकिन वही नेता अब महाराष्ट्र में खुद को उत्तर भारतीयों का बड़ा नेता बताने की कोशिश कर रहे हैं। आलोचकों का यह भी सवाल है कि यदि भाजपा और महायुति गठबंधन को वास्तव में उत्तर भारतीय समाज की इतनी ही चिंता है, तो फिर सरकार गठन के दौरान किसी भी उत्तर भारतीय नेता को मंत्री क्यों नहीं बनाया गया। क्या यह मुद्दा केवल चुनाव के समय ही याद आता है? क्या उत्तर भारतीयों की आवाज़ सिर्फ वोट बैंक की राजनीति तक सीमित है? भाजपा द्वारा ऐसे विवादित और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे नेताओं पर भरोसा जताने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस तरह की बयानबाजी से पार्टी को अल्पकालिक चुनावी फायदा भले मिल जाए, लेकिन दीर्घकाल में इससे विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है। अब देखना यह होगा कि महानगर पालिका चुनावों में इस तरह के बयान और पहचान की राजनीति भाजपा और उसके नेताओं को कितना लाभ पहुंचा पाती है, या फिर जनता इन दावों को केवल चुनावी शिगूफा मानकर नकार देती है।




