
पवन वर्मा
भारतीय धर्मग्रंथों विशेषकर वेदों और श्रीमद्भगवद गीता में कहा गया है कि जब-जब इस धरती पर अधर्म एवं पाप की वृद्धि होती है, तब-तब धर्म की स्थापना तथा दुष्टों एवं दुष्कृत्यों के विनाश के लिए भगवान स्वयं या उनका कोई प्रतिनिधि इस धराधाम पर अवतरित होता है। गीता में तो यह बात भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने मुख से कही है पर वेदों में भी इस अवधारणा का वर्णन है। यजुर्वेद में कहा गया है कि परमात्मा अजन्मा है पर वह अनेक प्रकार से उत्पन्न होता है। ऋग्वेद में परमात्मा को प्राणियों का हित चिंतक कहते हुए कहा गया है कि ईश्वर बार-बार अनेक रूप धारण करता है। भारतीय पुराण, ईश्वर के इन्हीं अवतारों की कथाओं से भरी पड़ी हैं। इन कथाओं के अनुसार ईश्वर ने न केवल मानव के रूप में (राम, कृष्ण, परशुराम, वामन आदि के) अवतार लिए हैं, अपितु वे अन्य प्राणियों के रूप में (कच्छप, मत्स्य, वाराह आदि)के रूप में भी अवतरित हुए हैं तथा उन्होंने दुष्टों, दानवों, राक्षसों आदि से मानवता, धर्म एवं पृथ्वी की रक्षा की है, पर एक अवतार ऐसा भी हुआ है जो मानव और पशु का संयुक्त रूप है। यह अवतार नरसिंहावतार के नाम से प्रसिद्ध है और इस अवतार की कथा होली के त्यौहार से जुड़ी हुई है। यदि धर्मग्रंथों में वर्णित आख्यानों का गहराई और बारीकी से अध्ययन किया जाए तो नरसिंह अवतार की एक विशेषता यह थी कि यह अवतार बुद्धि एवं बल का सम्मिलित एवं संयुक्त स्वरूप था। श्रीमद्भागवत में भगवान विष्णु के विविध अवतारों के साथ नरसिंह अवतार की भी कथा है। इसी कथा के अनुसार हिरण्य कश्यप ने घोर तपस्या करके भगवान विष्णु से ही यह वरदान ले लिया था कि वह न दिन में मरे न रात में, न पृथ्वी पर मरे न जल में, न देवों से मारा जाए न मनुष्यों से। इस वरदान की प्राप्ति के बाद वह अपने आपको अजर-अमर मानने लगा। मृत्यु के भय से मिली मुक्ति ने उसे घोर अहंकारी बना दिया, फलस्वरूप उसने भगवान की सत्ता एवं अस्तित्व को ही चुनौती देना शुरू कर दी। इस अहंकार ने उसे अत्याचारों की ओर उन्मुख किया। पर हिरण्य कश्यप का पुत्र प्रहलाद ईश्वर भक्त था। उसकी भक्ति हिमालय सरीखी अचल और अटल थी। धमकियां जब उसे भक्ति मार्ग से विचलित नहीं कर पाईं तो हिरण्य कश्यप ने उसे नाना प्रकार के कष्ट देना शुरू किया।
प्रह्लाद को विषपान कराया गया, उसे पहाड़ों से गिराया गया पर वह अपने पथ से विचलित नहीं हुआ। इस हिरण्य कश्यप की एक बहिन थी होलिका। उसे वरदान था कि अग्रि उसे जला नहीं सकती। नतीजे में अहंकारी और अत्याचारी हिरण्य कश्यप ने एक चिता बनाकर प्रह्लाद और होलिका को बिठा दिया तथा उसमें अग्रि प्रज्ज्वलित कर दी। बस इसके बाद ही हुआ भगवान नरसिंह का अवतार। वस्तुत: यह अवतार विलक्षण बुद्धि और अपूर्व बल के समन्वय और सम्मिलन का अवतार था। भगवान विष्णु एक खम्भे से प्रकट हुए। उनका अवतरण संध्या काल में हुआ, जब न दिन था और न रात। उनका यह स्वरूप न मानव का था और न देवता का, क्योंकि मस्तक सिंह का था शेष धड़ मानव का। उन्होंने अपने नाखूनों से हिरण्य कश्यप का वध किया अर्थात् न उन्होंने अस्त्र का प्रयोग किया और न शस्त्र का। उन्होंने हिरण्य कश्यप का वध अपने घुटनों पर रखकर किया अर्थात् न धरती थी और न जल। भारतीय धर्मग्रंथों और पुराणों में विभिन्न अवतारों के जो वर्णन मिलते हैं, उनसे अक्सर यह मान लिया जाता है कि भारत में अनेक देवी-देवताओं को पूजने की परम्परा रही है। वस्तुत: अवतारों का अर्थ यह है कि ईश्वर एक ही है, वह धर्म एवं भक्तों की रक्षा के लिए देश, काल और परिस्थिति के अनुरूप अलग-अलग स्वरूपों में धर्म की स्थापना के लिए प्रकट होता है। नरसिंह अवतार के माध्यम से भगवान विष्णु ने अहंकार और अत्याचार का अंत किया। उनके इस अवतार की विभिन्न देवी-देवताओं ने वंदना की। ब्रह्मा जी ने उनकी वंदना में कहा कि समस्त प्राणियों में बुद्धि एवं विवेक की दृष्टि से मनुष्य श्रेष्ठ है तथा बल एवं साहस की दृष्टि से सिंह श्रेष्ठ है, इसलिए भगवान विष्णु ने दो श्रेष्ठ गुणों के संयुक्त स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हुए यह अवतार लिया। नरसिंह अवतार का जो विवरण धर्मग्रंथों में मिलता है, वह उग्रता और वीरता का है।
राम के अवतार की विशेषता यदि मर्यादा है, कृष्ण के अवतार की विशेषता यदि कर्मयोग एवं कूटनीति है तो नरसिंह अवतार की विशेषता उग्रता और वीरता है। बुराई एवं अत्याचार के दमन के लिए उग्रता और वीरता का सहारा लेना ही इस अवतार की विशेषता रही है। इसका भावार्थ यह भी है कि पाप के अंत के लिए भगवान को भी उग्र रूप धारण करना पड़ा पर इसके साथ ही इस अवतार की महत्ता वर्णित करते हुए ब्रह्मा एक स्थान पर कहते हैं कि ईश्वर ने नर और सिंह के रूप और गुणों का यह संयुक्त अवतार विश्व के कल्याण के लिए किया था। ईश्वर का यह संयुक्त स्वरूप अविनाशी और सनातन है। भारत में नरसिंह भगवान के मंदिर भी कई स्थानों पर मिलते हैं। उनकी पूजा और आराधना भी होती है। धर्मग्रंथों में कहा गया है कि भगवान नरसिंह की उपासना और आराधना से प्राणियों के कल्याण के लिए शक्ति और बुद्धि प्राप्त होती है। आज के प्रसंग में यदि हम धर्म कथाओं पर विश्वास नहीं भी करें तो हमें यह तो मानना ही होगा कि नरसिंह अवतार की कथा कम से कम यह शिक्षा तो देती ही है कि अहंकार और अत्याचार का अंत अवश्य ही होता है।




