
आज जब लालकिले से झंडा फहराया जाएगा, तो देश भर में उत्साह के साथ स्वातंत्र्य दिवस मनाया जाएगा। राष्ट्रीय पर्व है, खूब मनाइए, लेकिन सोचिए, क्या लाखों बलिदानियों, हजारों की फांसी, लाठियां, गोलियां, इसी लिए खाई थी हमारे पूर्वजों ने कि भारत का यही हाल हो? नफ़रत के बीज बोकर, हिंदू-मुस्लिम ही नहीं, जातियों में बांटकर, वैमनस्य फैलाया जाए? भाई को भाई से, पड़ोसी को पड़ोसी से, हिंदू को मुसलमान से, सवर्णों को दलितों से लड़ाकर, भारत की अस्मिता, एकता, अखंडता को खत्म किया जाए। यही “बांटो और राज करो” की नीति अंग्रेजों ने चलाई थी। अंग्रेजों “भारत छोड़ो” नारे पर, देश का हर देशभक्त सड़कों पर उतरा। मुगल वंद्य के अंतिम बादशाह, बहादुर शाह जफर को, तब के यांगून जेल में डाला गया। वहीं गुमनाम मौत हुई। अंतिम समय में भी उनका देशप्रेम कम नहीं हुआ। याद करें उनके अंतिम शब्द- “दो गज जमीं भी न मिली कुएं यार में”। आजादी की जंग में सरहदी गांधी भी मुसलमान थे। शास्त्र क्रांतिकारियों को फांसी दी गई, उसमें हर क़ौम, हर जाति के लोग थे। मंगल पांडेय के द्वारा क्रांति का आरंभ हुआ। जो लोग गांधी के आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेज सरकार को पत्र लिख रहे थे, आज देशभक्ति का सर्टिफिकेट बांट रहे हैं। सड़कें पहली भी बरसात झेल नहीं पा रहीं, बड़े-बड़े गड्ढे बनकर दुर्घटना को आमंत्रित कर रही हैं। नई-नई बनी सड़कें बह जा रही हैं। बनते और उद्घाटन के पहले ही पुल जलसमाधि ले रहे हैं। सत्तर साल का हिसाब मांगने वाले, दस वर्षों का हिसाब तक नहीं दे पा रहे। अपनी गलतियों को छुपाने के लिए नेहरू को दोषी बताया जा रहा है। नेहरू, इंदिरा के बनाए सारे सरकारी संस्थानों को, चंद पूंजीपतियों के हाथों दे दिया गया है। इसरो, भाभा, रेल, तेल, गेल, पोर्ट, एयरपोर्ट बेच दिए गए। तमाम चीजों पर टैक्स पर टैक्स लगाकर, आम भारतीयों का जीवन मुहाल कर दिया गया। सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं। स्कूलों की छतें गिरने से मासूम बच्चों की मौत का कोई ग़म नहीं। शिक्षा, बिजली, सब का प्राइवेटाइज किया जा रहा है। मुंबई में रहने वाले खुद बिजली बिल देखें। बीएसईएस, टाटा, रिलायंस और अब अडानी के बिजली बिलों की तुलना कर देखें, प्राइवेटाइज का क्या असर पड़ा है? हवाईअड्डों पर जाने पर चाय, कॉफी, नाश्ता के बिल भी देखें। गरीबों को अशिक्षित बनाए रखने का षड्यंत्र रचा गया है। “अनपढ़ रहेगा इंडिया, तो गुलाम रहेगा इंडिया”।
आईटी, सीबीआई और ईडी का गलत उपयोग करके, विपक्षी नेताओं को जेल भेजने, भ्रष्टाचारियों को अपने साथ लेकर, ईमानदारी का सर्टिफिकेट देने और जांच रोकने का क्या मतलब निकाला जाए? हद तो तब हो गई जब चुनाव में ईवीएम में गड़बड़ी करके, हार रहे लोग जीतने लगे। एक ही वोटर आईडी वाले, कई-कई राज्यों में शिफ्ट किए जा रहे। मतगणना के समय जो ईवीएम सत्तर प्रतिशत चार्ज दिखाती रही, वहां विपक्ष जीतता रहा, लेकिन जिन ईवीएम को 99 प्रतिशत चार्ज पाया गया, वहां बीजेपी को 90 प्रतिशत वोट कैसे मिले? जीत कैसे हुई? महाराष्ट्र, हरियाणा में जनमत विपक्ष के साथ था, लेकिन हारता रहा। वोट चोरी की जाती रही, चुनाव आयोग को गुलाम बनाकर। सुप्रीमकोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए, आदेश के खिलाफ संसद में बहुमत के बूते, बदलकर बताया गया कि सरकार सुप्रीमकोर्ट का कोई आदेश नहीं मानेगी। राहुल गांधी ने बंगलुरु के महादेव चुनाव क्षेत्र की वोटर लिस्ट पर, अपने कार्यकर्ताओं, विशेषज्ञों के साथ कड़ी मेहनत कर प्रमाण जुटाए कि, एक क्षेत्र में एक लाख वोट बढ़ाए गए। एक-एक पते पर डेढ़ से ढाई सौ वोटर मिले। महाराष्ट्र चुनाव में अंतिम घंटे में कई लाख वोट पड़ना कैसे संभव हुआ? लोकसभा चुनाव में सात करोड़ वोट बढ़ाने के बाद, चुनाव आयोग ने अपनी गलती की क्षमा मांगी। बिहार में गैरसंवैधानिक रूप से SIR लागू किया गया। बीएलओ के साथ सवा लाख आरएसएस के स्वयंसेवक लगाने का प्रयोजन क्या था? अकेले बिहार में 65 लाख वोटरों के नाम, जो अभी जीवित हैं, मृतक बताकर काट दिए। सुप्रीमकोर्ट में बड़ी बेहयाई के साथ, चुनाव आयोग ने कहा, “हम बिहार में काटे गए 65 लाख लोगों की लिस्ट नहीं देंगे”। जबकि बहस के समय, सामाजिक कार्यकर्ता यादव ने एक महिला को जीवित लाकर, सुप्रीमकोर्ट में खड़ा कर दिया, जिसे मृतक बताकर नाम काट दिया गया था। ऐसे तमाम लोग, बिहार से अब दिल्ली, राहुल गांधी के कार्यालय में पहुंचकर, अपने जीवित होने का प्रमाण दिखा रहे हैं, जिनके नाम काट दिए गए। मजेदार बात यह कि एक भी बीएलओ, घर-घर जाकर रिवीजन नहीं कर रहा। ऑफिस में बैठकर ही मनमाने ढंग से नाम काटे जा रहे। एक स्थान पर तो बीजेपी जिला अध्यक्ष को, बीएलओ के साथ कुर्सी पर बैठकर निर्देश देने का वीडियो वायरल हुआ। निष्पक्ष पत्रकार अजीत अंजुम ने, खुफिया कैमरे से वोट चोरी का घोटाला होते लाइव पकड़ा। यहां तक कि अब निष्पक्ष पत्रकार खुद लोगों के गांव जाकर, काटे गए नामों की पड़ताल कर रहे, जिनमें जीवित लोग मिल रहे, अपने प्रमाण के साथ, जबकि उन्हें मृत बनाकर नाम काट दिए गए हैं। आरोप लगाया जा रहा है कि पूरे देश में, छः करोड़ मुसलमानों के नाम काटे गए। बंद घरों में ढाई सौ वोटर के नाम मिले हैं, दस गुणा दस वाले एक कमरे में सत्तर लोगों का नाम। कुछ ऐसे नाम हैं, जो बेंगलुरु, बनारस और लखनऊ में भी वोटर हैं, जो बीजेपी वाले हैं। खुद पीएम के चुनाव क्षेत्र वाराणसी में, एक ही बाप के 40 बेटे मिले, जिनके नाम वोटर लिस्ट में हैं। अहम बात यह कि, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त के विदेश भाग जाने की खबरें आ रही हैं। सवाल पूछा जा रहा है चुनाव आयोग से, तो जवाब बीजेपी देने लगती है। बीजेपी से सवाल पूछा जाए, तो गोदी मीडिया जवाब देने लगती है। समझ में नहीं आता कि, जिससे सवाल किया जाता है वह जवाब देने आगे नहीं आता, दूसरे लोग आगे क्यों आते हैं? देश के जन-गण-मन से सवाल है- “वन नेशन वन इलेक्शन” का नारा देने का रहस्य क्या, वन पार्टी बनती नहीं दिख रही? क्या होगा जब देश में एक ही दल सत्तारूढ़ रहेगी, तो भविष्य में चुनाव का ढोंग भी नहीं करना होगा? जागो जन-गण-मन, जागो। अपने अधिकार जानो और उठ खड़े हो। भारतीय संविधान और लोकतंत्र बचाने के लिए, अन्यथा राजतंत्र की तानाशाही ही रहेगी, तब तुम्हारा क्या होगा? अपना और अपनी आगे आने वाली पीढ़ी का भविष्य बनाना तुम्हारे हाथों में है। देशवासी यह नहीं भूलें कि, जिस नेहरू को दोषी बताकर भ्रम फैलाती है बीजेपी, उसी नेहरू और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के कांग्रेस की अध्यक्षता में, जब ब्रिटिश सरकार भारत को “डोमिनियन स्टेट्स” देने का प्रस्ताव कर रही थी, तब नेहरू ही ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने कांग्रेस की मांग को खारिज करते हुए, 700 पेज का प्रस्ताव पारित कराया, जिसमें कांग्रेस ने कहा, भारत को ब्रिटेन से संबंध तोड़कर, पूर्ण स्वराज पाना होगा। अगले ही साल, गांधी ने दांडी में सविनय अवज्ञा आंदोलन के तहत, नमक सत्याग्रह शुरू किया। आर. जे. मूर की किताब The Crisis of Indian Unity में स्पष्ट लिखा है, तब वायसरॉय लॉर्ड इरविन ने कहा था, “एक बूढ़ा आदमी समुद्र तट पर नमक बनाकर हमारी सत्ता को चुनौती दे रहा है। भारत को डोमिनियन स्टेट्स देना, ब्रिटिश साम्राज्य को खतरे में डालेगा”। सिर्फ इतने से ही, भारत की आजादी में महात्मा गांधी और नेहरू की अहमियत समझ में आ जाती है- कितने भयभीत थे अंग्रेज दोनों से।