
जिस धर्मप्राण राष्ट्र में “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता” जैसा आदर्श सूत्र दिया गया हो, जहां नारी को शक्ति स्वरूपा- मां महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती और मां दुर्गा के रूप में पूजित किया जाता हो, जहां नवरात्रि के उपरांत बालिकाओं के चरण धोकर उन्हें सम्मानित करने की प्राचीन परंपरा रही हो, उसी देश में नारी अस्मिता आज भी असुरक्षित क्यों है? समाजशास्त्री हों या सनातन धर्म के विशेषज्ञ, वे नारी की गरिमा अक्षुण्ण रखने का स्थायी उपाय खोजने में सफल क्यों नहीं हुए? सरकारों में बैठे माननीय भी नारी सुरक्षा को लेकर बयानबाजी से आगे क्यों नहीं बढ़ पाए? जिस राष्ट्र की सर्वोच्च पंचायत लोकसभा में ही महिलाओं के मान-मर्दन के आरोपों से घिरे जनप्रतिनिधि सत्ता का सुख भोगते दिखाई देते हों, वहां सख्त कानूनों की उम्मीद कैसे की जाए? आज तक संसद में ऐसा कठोर प्रावधान पारित नहीं हो सका, जो बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के लिए निश्चित और त्वरित दंड सुनिश्चित करे। परिणामस्वरूप, महिलाओं के खिलाफ हिंसा, दुष्कर्म और हत्या जैसी घटनाएं रुकने का नाम नहीं लेतीं। ऐसे दरिंदे सत्ता के भीतर भी मिलते हैं और बाहर भी। जब सत्ता का घमंड सिर चढ़कर बोलता है और अपराधियों को बचाने का प्रयास होने लगता है, तब नारी अस्मिता की रक्षा कैसे संभव होगी? हर महिला, नाबालिग बच्ची या किशोरी अपनी सुरक्षा स्वयं सुनिश्चित नहीं कर सकती। यह दायित्व विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का है कि वे महिला सुरक्षा और उसके सम्मान की रक्षा करें। दुर्भाग्य से, व्यवस्था इस कसौटी पर खरी नहीं उतर पा रही। यदि माली ही बगिया उजाड़ने लगे, तो फूलों की सुरक्षा कैसे होगी? दावे किए जाते हैं कि आधी रात को भी महिला निर्भय होकर चल सकेगी। कहा जाता है कि अपराधी को तुरंत दंड मिलेगा। परंतु कथनी और करनी में अंतर साफ दिखाई देता है। कानून-व्यवस्था पर भ्रष्टाचार और अक्षमता के आरोप लगातार लगते रहे हैं। “कानून सबके लिए बराबर है”- यह वाक्य अक्सर एक कटु व्यंग्य जैसा प्रतीत होता है। संसाधन और प्रभाव रखने वाले व्यक्ति न्याय की दिशा मोड़ लेते हैं, जबकि अनेक निर्दोष वर्षों तक जेलों में पड़े रहते हैं। पुलिस व्यवस्था पर भी सवाल उठते हैं। यद्यपि यह सत्य है कि सभी पुलिसकर्मी भ्रष्ट नहीं होते- अनेक ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते हैं। फिर भी पीड़ितों की शिकायत न सुने जाने और उल्टे उन्हें ही कानूनी उलझनों में फंसाए जाने की घटनाएं चिंता पैदा करती हैं। थानों के बाहर “परित्राणाय साधूनाम, विनाशाय च दुष्कृताम” के बोर्ड अवश्य लगे होते हैं, परंतु व्यवहार में यह आदर्श हमेशा दिखाई नहीं देता।न्यायपालिका से समाज को सर्वाधिक आशा रहती है। किंतु जब एक ही कानून और धारा पढ़ने वाले अलग-अलग स्तरों के न्यायालयों के निर्णय परस्पर विरोधी दिखाई देते हैं, तो आमजन के मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है। जिला न्यायालय का निर्णय उच्च न्यायालय पलट देता है और उच्च न्यायालय का निर्णय सर्वोच्च न्यायालय। हाल ही में एक संवेदनशील मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक निर्णय ने व्यापक बहस को जन्म दिया। एक नाबालिग पीड़िता से संबंधित मामले में दिए गए निर्णय को लेकर समाज के अनेक वर्गों ने असंवेदनशीलता की आशंका जताई। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं संज्ञान लेते हुए उस निर्णय को निरस्त किया और स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण अत्यंत संवेदनशील और पीड़िता-केंद्रित होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश भी शामिल थे, ने स्पष्ट संदेश दिया कि यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक भाषा और दृष्टिकोण दोनों संवेदनशील होने चाहिए। साथ ही, राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को यह सुझाव दिया गया कि वह विशेषज्ञों की एक समिति गठित करे, जिसमें विधि विशेषज्ञ, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हों, ताकि न्यायाधीशों को यौन अपराधों के मामलों में और अधिक संवेदनशील बनाने के लिए दिशानिर्देश तैयार किए जा सकें। यह कदम स्वागतयोग्य है, परंतु मूल प्रश्न अभी भी शेष है- क्या समस्या केवल कानून की है, या मानसिकता की भी? जब तक समाज, सत्ता और न्याय व्यवस्था तीनों स्तरों पर नारी के प्रति दृष्टिकोण में वास्तविक परिवर्तन नहीं होगा, तब तक आदर्श वाक्य केवल श्लोक बनकर रह जाएंगे। नारी की पूजा करने वाला समाज यदि उसकी सुरक्षा सुनिश्चित न कर पाए, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि नैतिक विफलता भी है। प्रश्न कानून की धाराओं से अधिक, माननीय न्यायाधीशों और व्यवस्था की मानसिकता का है।




