
सदियों से देश का आदिवासी समाज जल, जंगल और जमीन का अधिकार रखता आया है। वनोपज, लकड़ी, शहद, कंद-मूल आदि उनके जीवन के मूल आधार स्तंभ रहे हैं। अलग-अलग राज्यों में जमीन की खरीद-फरोख्त के संदर्भ में अलग-अलग नियम-कानून हैं। सामान्यतः आदिवासियों को आबंटित जमीन गैर-आदिवासी नहीं खरीद सकता। जल, जंगल और जमीन की रक्षा करते हुए आदिवासी पीढ़ियों से इनका उपयोग करते आए हैं। स्वाभाविक है, जहां आदिवासी हैं वहां के वन उनकी संपत्ति माने जाते रहे हैं। बिना कलेक्टर या सरकार की अनुमति के आदिवासियों की जमीन खरीदी नहीं जा सकती। कथित तौर पर असम सरकार ने सीमा हंसाओ जिले में तीन हजार बीघा जमीन सीमेंट और पावर प्रोजेक्ट को दिए जाने को लेकर हाईकोर्ट ने इतनी अधिक जमीन दिए जाने पर हैरानी जताते हुए नोटिस जारी किए हैं। स्थानीय किसानों और संगठनों द्वारा विरोध किया जा रहा है। कुछ रिपोर्टों में बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन के कोकराझार जिले में भी विरोध हो रहा है। इस सरकारी आबंटन से आदिवासियों के सामने जीवन-यापन की समस्या उत्पन्न हो गई है, क्योंकि किसानों की अनुमति नहीं लिए जाने से आक्रोश फैल गया है। छत्तीसगढ़ स्थित हसदेव जंगल अडानी समूह को कोयला खनन के लिए मात्र एक रुपये की लीज पर दिया गया। स्थानीय आदिवासियों ने इसका जमकर विरोध किया। लाखों पेड़ काटे जाने से पर्यावरण पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो चुका है। इतना बड़ा जंगल क्षेत्र एक रुपये सालाना पर अडानी को दिया जाना आश्चर्य का विषय है। आदिवासी समुदाय तीन लाख से अधिक पेड़ काटे जाने का विरोध कर रहा था, लेकिन सत्ता की ताकत के सामने पुलिस बंदोबस्त के कारण आदिवासी हार मानने को मजबूर हो गए। पुरुष, महिलाएं और बच्चे- सभी हसदेव जंगल बचाने के लिए आंदोलनरत थे, लेकिन अंततः उनसे उनका अधिकार छीन लिया गया। अब अंडमान-निकोबार समूह के निकोबार द्वीपों में भी आदिवासी संकट में हैं, जहां पर्यटकों का जाना निषिद्ध है। भारत का नीति आयोग अब वहां ‘ग्रेट निकोबार परियोजना’ लाने की तैयारी में है। उस क्षेत्र के आदिवासियों का रहन-सहन, जीवन-पद्धति और संस्कृति शेष भारत से बिल्कुल अलग है। नीति आयोग निकोबार के दक्षिणी हिस्से में एक बड़ा समुद्री और हवाई केंद्र विकसित करने की योजना बना रहा है, जिसके लिए 166 वर्ग किलोमीटर जमीन की जरूरत होगी। इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर का हवाई अड्डा, कंटेनर फ्रेंडशिप पोर्ट, एक स्मार्ट टाउनशिप और 450 मेगावाट का गैस व सोलर ऊर्जा संयंत्र प्रस्तावित है। यह भूमि निकोबारी आदिवासियों के आरक्षित क्षेत्र में आती है। अंडमान क्षेत्र अब तक विकसित हो चुका है, जहां शेष भारत के हिंदू, सिख आदि नौकरियों और व्यापार में लगे हैं, लेकिन निकोबार इससे भिन्न है। निकोबार समूह में दो प्रमुख जनजातियां हैं। निकोबारी और शोम्पेन। निकोबारी मंगोलॉयड मूल के हैं, जबकि शोम्पेन एक अलग जनजाति है जो जंगलों में स्वतंत्र विचरण करती है। ये शिकारी और वन-आधारित जीवन जीने वाले लोग हैं, जो बाहरी दुनिया से लगभग कटे हुए हैं। सोनिया गांधी ने इसी अल्पसंख्यक समुदाय जिसकी संख्या मुश्किल से ढाई सौ के आसपास है के विलुप्त होने के खतरे पर चिंता जताई थी। खनन उद्योगों के कारण पैतृक भूमि से विस्थापन का दर्द झेलने वालों में उड़ीसा के मुंडा, पौड़ी भुइयां, झारखंड के संथाल और उरांव, छत्तीसगढ़ के गोंड और उरांव, असम के खामटी, सिंगफो, ताई-फांके, महाराष्ट्र के गढ़चिरौली और मध्यप्रदेश-गुजरात के लाखों आदिवासी शामिल हैं। इन सभी को खनन, बांध निर्माण और तथाकथित विकास परियोजनाओं के नाम पर विस्थापन का दंश झेलना पड़ा है। इन योजनाओं में पूंजीपतियों के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट हैं, जिन्होंने आदिवासियों को केवल उजाड़ा है, रोजगार या सम्मानजनक आजीविका नहीं दी। इन्हीं अन्यायों का परिणाम नक्सलवाद के रूप में सामने आया। एक शिक्षित मेकेनिकल इंजीनियर जब अपने गांव लौटा, तो उसने देखा कि जमींदार आदिवासियों के पूरे परिवार की दिनभर की मजदूरी में केवल एक पाव सावा दिया जाता है। जब उसने अधिकार की बात की, तो पुलिस द्वारा निर्दयतापूर्वक हत्याएं और आदिवासियों के झोपड़े जला दिए गए। वहीं से नक्सलवाद का बीज अंकुरित हुआ। सरकारें भले नक्सलियों को मार दें या आत्मसमर्पण को मजबूर करें, लेकिन अन्याय के विरुद्ध संघर्ष कभी खत्म नहीं होता। जब अन्याय और अत्याचार बढ़ते हैं, तो संघर्ष जन्म लेता है। किंतु दुखद यह है कि सत्ता और पुलिस हमेशा निर्बल और गरीब पर ही कहर ढाती हैं। समाधान के स्थान पर विरोधियों को समाप्त करना। यह राजनीति नहीं, अनीति है।



