
आजकल एपस्टीन फ़ाइल्स की बड़ी चर्चा है। धूर्त दौलत का लोभी एक द्वीप खरीदकर रिसॉर्ट बनाता है। दुनिया भर से छोटी-छोटी बच्चियों को स्मगल करके द्वीप पर मंगाता है। इसके साथ ही वह दुनिया भर के बड़े-बड़े पूंजीपतियों, बड़े नेताओं को आमंत्रित करता है। छोटी बच्चियों के साथ सेक्स का ऑफर देता है। उन बच्चियों को इंजेक्शन दिया जाता है ताकि मेच्योर हो जाएं। उनका लहू भी पीया गया ताकि कामुक लोग बुढ़ापे में भी जवान रह सकें। यहां तक कि उन मासूम बच्चियों को भूखा रखा जाता रहा ताकि विरोध न कर सकें। इतना ही नहीं, खुलकर सामने आया कि वे दरिंदे बच्चियों की हत्या कर उनका मांस पकाकर खाते भी थे। नेता और पूंजीपति इतने कामुक होंगे, कौन सोच सकता है? अब दूसरे विश्वयुद्ध के समय और उसके बाद आक्रमणकारी देश जिस राष्ट्र को पद दलित करते थे। वहां की महिलाओं को उठा लिया जाता था। उन्हें कैद कर अपने सैनिकों को हवस पूरी करने के लिए उपयोग में लाया जाता रहा है। यहां तक कि एक-एक महिला को एक ही दिन दर्जनों सैनिकों की हवस पूरी करने को बाध्य किया जाता रहा है। यदि कोई महिला गर्भवती हो जाए तो सेना के डॉक्टर गर्भपात करा देते थे। सैनिकों को प्यार करने की सख्त मनाही होती थी। अगर कोई सैनिक उन महिलाओं में से किसी को प्यार करने लगता और उससे बार-बार मिलता था तो उस सैनिक को जेल में डाल दिया जाता और महिला को यंत्रणा दी जाने लगती थी। ऐसी व्यवस्था एक नहीं, कई देश करते रहे हैं।जापान की घटनाओं का पता अब चला है जब जीवित रह गई महिलाओं ने सार्वजनिक रूप से बयान दिए। ठीक वैसे ही जैसे एपस्टीन का कच्चा चिट्ठा तब खुला जब भुक्तभोगी महिलाएं सामने आईं और आपबीती बताई। जापान ने जब अपने कब्जे वाले कोरिया, चीन, फिलीपींस, इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे कब्जे वाले राष्ट्रों से वहां की महिलाओं को उठवाकर, अच्छी नौकरी का प्रलोभन देकर यौन दासता के नर्क में धकेल दिया गया। द्वितीय विश्वयुद्ध के पचास साल बाद 1993 में जापान ने सेना की संलिप्तता स्वीकार किया (कोनो स्टेटमेंट) कहा गया। 2015 में जापान और दक्षिण कोरिया के बीच पीड़ितों के मुआवजे को लेकर एक समझौता भी हुआ था। 2015 में जापान और दक्षिण कोरिया के बीच पीड़ितों के मूववजे को लेकर एक समझौता भी हुआ था। सिर्फ जापान ही नहीं, इतिहास गवाह है कि यौन हिंसा का यह काला खेल अन्य देशों की सेनाओं ने भी खेला। जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने जर्मन सेना के लिए बेहरमचता वेश्यालय बनाए थे। सोवियत संघ 1945 में बर्लिन पर कब्जे के दौरान लाखों जर्मन महिलाओं के साथ यौन हिंसा की गई। अमेरिका के वियतनाम और कोरिया युद्ध के समय बार गर्ल और वेश्यालयों जैसी व्यवस्था की गई, जिसके कारण हजारों लावारिश बच्चे पैदा हुए। 1990 दशक में सर्बियाई सेना द्वारा बोसनिया युद्ध में रेप कैंप चलाने का शर्मनाक वाकया सामने आया। आज दक्षिण कोरिया और दूसरे देशों में इन महिलाओं की याद में स्मारक बने मिलते हैं, जो चीख-चीख कर कहते हैं, आज भी मनुष्य की सोच और कर्म सातवीं से दशावी शताब्दी की बर्बरता दिखाई देती है।
आज भारत से हर वर्ष लाखों महिलाएं, छोटी बच्चियां ही नहीं, मासूम बच्चों के गायब होने की सूचनाएं विचलित करती हैं। लगता है एक नहीं, कई-कई एपस्टीन फाइल अनदेखी बन रही हैं। दुर्भाग्य वश हमारे देश की पुलिस सत्ता की भक्ति करने में इतनी तल्लीन हो चुकी है कि जनता के प्रति उपेक्षा के भाव झलकते हैं, क्योंकि गायब होने वालों में चंद लोगों को ही ढूंढ सकी है भारत की पुलिस। यहां तक कि केंद्रीय गृहमंत्री के अधीन आने वाली दिल्ली पुलिस नकारा साबित हो चुकी है, जो रोज-रोज दिल्ली से पचासों लोगों के गायब होने के बावजूद किसी को ढूंढ नहीं पाई है। यही हाल देश भर की पुलिस का है। सत्ता की सेवा करना ही पुलिस का कर्म और दायित्व बन चुका है। सच तो यह है कि पुलिस सत्ता की गुलाम बन चुकी है, जिससे जनता कोई उम्मीद नहीं कर सकती। कहते हैं दुनिया तरक्की कर रही है। मनुष्य सभ्य हो गया है, लेकिन मानवीय दृष्टिकोण से देखें तो लगता है मनुष्य बर्बर जंगली शिकारी बन चुका है। एपस्टीन फाइल और आक्रमणकारी राष्ट्रों के सैनिकों की भूमिका देखकर तो मनुष्य अब भी पहले हजारों साल से भी अधिक बर्बर हो चुका है। सभ्य होने की बातें सिर्फ किताबों तक सीमित रह गई हैं। कारण है जंगली व्यवस्था, अन्यायी व्यवस्था, जो बर्बर शासकों, प्रशंसकों के द्वारा दुनिया पर थोपा गया है।




