Thursday, March 12, 2026
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संपादकीय: आसान नहीं है मुल्क से उर्दू को मिटाना!

हिन्दी खड़ी बोली में मेरठ से शुरू हुई। एक घटना है। जापान के एक बड़े नेता भारत आए थे। मेरठ के एक व्यक्ति ने फोन पर उनसे अंग्रेजी में मिलने की इजाज़त मांगी। जापानी ने पूछा, आप की मातृभाषा क्या है? उत्तर मिला हिंदी। जापानी ने पूछा, फिर आप ने इंग्लिश में क्यों कहा? उत्तर दिया, आप को विदेशी समझकर मैने अंग्रेजी में कहा। आपको गुलाम भाषा इंग्लिश में बोलते शर्म नहीं आती? ऐसा जवाब जापानी ने मेरठ वाले से कहा। हिंदी के गढ़ मेरठ के होने पर भी आपका इंग्लिश में अनुमति मांगना बड़े शर्म की बात है। आपको जानना चाहिए था, विदेशी जरूर हूं मगर अंग्रेज नहीं। या तो आप अपनी मातृभाषा हिंदी बोलते या फिर हमारी जापानी। भाषा का गर्व यह होता है। अंग्रेजी की वकालत करने वाले योगी जी को पता नहीं होगा देश में हिंदी बोलने में शर्म करते हैं हिंदी भाषी। योगी जी आप देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री हैं। आप जब विधानसभा में कहते हैं, उर्दू में पढ़ाने की वकालत करते हैं। क्या आप मौलवी बनाना चाहते है। योगी जी यह वकालत लफ्ज़ भी तो उर्दू का ही है। एक भी हिंदी भाषी बताइए जो बिना उर्दू के दस वाक्य बोलकर दिखा दे? उर्दू मुसलमानों की भाषा नहीं है। शायद आप भूल गए यह तथ्य। आपको ऐसा बोलना ही नहीं चाहिए। उर्दू लिपि है। जिसके लश्करी जुबान भी कहते हैं। हिंदू उर्दू आज इस तरह आपस में घुल मिल गए हैं कि पता ही नहीं चल पाता कि हम हिंदी नहीं उर्दू बोल रहे हैं। सुप्रसिद्ध आई ए एस की कोचिंग करने वाले दिव्य कीर्ति ने एक शेर सुनाया था। उर्दू को हम मिटा देंगे इस सारे जहां से। कमबख्त ने यह बात भी उर्दू में कही है।। पाकिस्तान में उर्दू भारत से आयातित है। उनके भी किसी वाक्य में सिर्फ उर्दू ही हो ढूंढकर भी नहीं बताया जा सकता क्योंकि उर्दू में भी संस्कृत भाषा के तमाम शब्द इस तरह घुल मिल गए हैं जैसे हिंदी में उर्दू बिल्कुल पानी में चीनी की तरह शरबत बनकर जिसका स्वाद मीठा होता है। नफरत की राजनीति करते करते शायद मुख्यमंत्री यह भूल गए हैं कि साथ साथ चलने से भाषा विकसित होती है। हिंदी में घुल गया उर्दू है इस तरह। आसान नहीं है करना अलग उनको।। योगी जी को शायद ज्ञात नहीं है कि अंग्रेजी बोलने वाले हमारे देश में एक प्रतिशत भी नहीं हैं जिन्हें बकायदा अंग्रेजी ज्ञान हो। आज अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने वाले बच्चों को हिंदी भाषा की समझ ही नहीं है। हिंदी में तमाम आंग्लभाषा के शब्द घुले हैं। रेल ट्रेन स्टेशन बैंक खाना खजाना मुमकिन असल जैसे शब्द इतने घुल मिल गए हैं कि लौह पथ गामिनी, विराम स्थल, कोषागार, भोजन कहना मुश्किल लगता है। दवा खाना को औषधालय कहना कितना कठिन है? उर्दू के लफ्ज़ हिंदी से जुड़कर खूबसूरत माला निर्माण करते हैं। हिंदी और उर्दू के शब्द मोती की मनियां बन कर सुंदर माला निर्माण करते हैं। यूपी और दूसरे बीजेपी शासित राज्य जिनमें हिंदी भाषी राज्यों में ही मुसलमान उर्दू बोलते हैं जिसमें आधी से अधिक शब्द संस्कृत के होते हैं जबकि देखा जाए तो बंगाल में बांग्ला, तमिलनाडु में तमिल, आंध्रप्रदेश कन्नड़, केरल में मलयालम उड़ीसा में उड़िया भाषा ही बोलते हैं देश के मुसलमान। गुजरात के मुसलमान गुजराती बोलते सुने जा सकते हैं। अर्थात मुसलमान जिस प्रदेश में रहता है उसी प्रदेश की भाषा बोलता है। ऐसे में उर्दू मुसलमानों की भाषा है सरासर नाइंसाफी है। गलत है। बांग्लादेश के मुसलमान बंगाली ही बोलते मिलेंगे। एक अत्यावश्यक प्रश्न हैं। योगी जी बताएं कि हिंदुओं की भाषा संस्कृत जानने पढ़ने बोलने वाले कितने प्रतिशत हैं पूरे देश में? इतने कम लोग संस्कृत भाषा में बोलते इसलिए हैं कि संस्कृत भाषा को केवल संभ्रांत लोगों तक ही सीमित रखा गया जिसके पीछे संकुचित भावना रही है ताकि देश का हर तबका संस्कृत न पढ़ सके। केवल धार्मिक कर्मकांडो की भाषा बनकर सीमित रह गई है संस्कृत भाषा। सपा के शासन में संस्कृत विद्यालयों महाविद्यालयों में संस्कृत के अध्यापकों को वेतन दिया जाता रहा है लेकिन लगभग आठ वर्ष से उत्तर प्रदेश में बीजेपी का शासन है। जिन संस्कृत महाविद्यालयों में नौ शिक्षकों को मान्यता मिली हुई थी उनके रिटायर होने के कारण रिक्त पद बीजेपी की योगी सरकार क्यों नहीं भर रही? दो तीन संस्कृत महाविद्यालयों के लोगों के शिक्षकों से व्यक्तिगत मिलना जुलना है मेरा लेकिन वहां संस्कृत प्राध्यापकों की संख्या नौ की जगह दो हो चुकी है। जिसमें एक तो छः महीने में सेवामुक्त होने वाले हैं। मात्र एक प्रवक्ता के सहारे महाविद्यालय में पठन पाठन कैसे संभव होगा? निःशुल्क सुझाव है योगी जी को सबसे पहले संस्कृत विद्यालयों और महाविद्यालयों को जिन्हें मान्यता मिली हुई है उन्हें प्रचुर अनुदान देते हुए गणित समाजशास्त्र विज्ञान जैसे विषयों से संबंधित आचार्यों की भर्ती करें। उन्हें पदानुसार वेतन देने बिल्डिंग अनुदान देने की व्यवस्था करें। उर्दू का विरोध करने की राजनीति छोड़ दें क्योंकि चाहकर भी वे उर्दू को मिटा नहीं पाएंगे। शायद योगी जी को ज्ञात नहीं है मुस्लिम यूनिवासियों में यू पी एस सी की मुफ्त कोचिंग व्यवस्था की गई है जिस कारण अनेक मुसलमान बच्चे आई ए एस बन रहे है। उन मुस्लिम यूनिवर्सिटी से प्रतियोगिता करते हुए आप भी केंद्रीय विश्वविद्यालयों को छोड़ भी दे तो राजकीय विश्वविद्यालयों में यूपीएससी की कोचिंग निशुल्क देने की व्यवस्था करके हिंदी भाषी बच्चों को सरकारी उच्चाधिकारी बनाने का यत्न करें। ताकि मेधावी किंतु गरीब से गरीब हिंदू छात्र भी सरकारी उच्चतम पदों के योग्य बन सकें। नफरत से नफरत फैलती है प्यार नहीं। यदि आप किसी भाषा किसी कौम से नफरत करते रहेंगे तो अपनी कौम का विकास नहीं कर पाएंगे। धर्म के नाम पर हिंदू जनमानस को मूर्ख गुलाम बनाकर वोट लेने के लिए किसी राम मंदिर और महाकुंभ की ब्रांडिंग करने की जरूरत ही नहीं होगी। आपके शासनकाल में कितने सरकारी प्राथमिक, पूर्व माध्यमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालय खोले गए? कितनों में सुयोग्य सभी विषयों के जानकर शिक्षक नियुक्त किए गए? कितनी लाइबेरिया और कितने विज्ञान की प्रयोगशालाएं खोली गई? पहले इसकी जानकारी ले लें। आपके मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री ऐसे व्यक्ति को बनाया गया जो लाख तक की संख्या भी देखकर पढ़ नहीं सकता हो तो फिर शिक्षा के उन्नयन और विकास की उससे कैसे उम्मीद की जा सकती है? सच तो यह है कि आपके मंत्रिमंडल में ही आप की नहीं चलती। प्रशासन आजाद है कुछ भी करने के लिए। कदाचित अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बनाने के लिए मुस्लिमों से नफरत और उर्दू पढ़कर मौलवी बनाना चाहते हो कहने की मजबूरी आ गई हो। बेहतर होगा नफरत नहीं प्रेम पैदा करिए लोगो के दिलों में। आपके लिए सम्मान बढ़ाने का काम होगा। जनप्रिय बनिए। एक कौम का विरोध कर शायद पुनः सत्ता में आ जाएं आप लेकिन सवाल उठेगा मुसलमानों से नफ़रत कर, उर्दू भाषा मिटाने की कोशिश हो या मुसलमानों की मस्जिद घर पर बुलडोजर चलवाकर आप किस हिंदू का भला कर रहे हैं? यह सवाल आज नहीं तो कल आपके भक्त अवश्य पूछने को बाध्य हो जाएंगे तब आपके पास चुप रहने के अलावा कुछ भी नहीं रहेगा। योगी जी को थोड़ा इतिहास पढ़ना चाहिए वह भी मुगल कालीन। राणा सांगा और बाबर युद्ध में कोई राजपूत सांगा का साथ देने नहीं आया था। मुस्लिम शासक मिलकर लड़ा। उन्हीं के कुल के महाराणा प्रताप और अकबर युद्ध में अकबर का सेनापति राजपूत मानसिंह था। यहां तक कि राणा प्रताप का भाई भी मुगलों की तरफ था जबकि राणा प्रताप का सेनापति मुस्लिम था। बाद में छत्रपति शिवाजी का सेनापति भी कोई मराठा नहीं मुसलमान था। कृष्ण की वंदना करने वाले रहीम कौन थे? यहां तक कि देश के महान सपूत भगत सिंह ने भी उर्दू स्कूल में शिक्षा ली थी और भारत को अंग्रेजों की बेड़ियों से मुक्त करने के लिए विदेश में आजाद हिंद सेना का निर्माण करने वाले सुभाषचंद्र बोस के सेनापति भी मुस्लिम था जिसे भारत सरकार ने सम्मानित किया था राष्ट्रपति के हाथों।

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