
राजनीति कभी भी “रिटायरमेंट प्लान” नहीं हो सकती। उसका मूल स्वभाव समाज सेवा, जवाबदेही और नैतिक प्रतिबद्धता है। पड़ोसी देश श्रीलंका ने हाल ही में एक ऐसा निर्णय लिया है, जिसने इस बहस को फिर से जीवित कर दिया है। वहां सांसदों को सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन समाप्त करने का फैसला किया गया। संसद में इस विषय पर चर्चा के दौरान न्याय मंत्री हर्षना नानायक्कारा ने तीखे शब्दों में कहा कि जनप्रतिनिधियों का आचरण ही तय करेगा कि वे विशेषाधिकारों के पात्र हैं या नहीं। राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके की सरकार ने दशकों पुराने प्रावधान को बहुमत से समाप्त कर यह स्पष्ट संकेत दिया कि राजनीति आजीवन आर्थिक सुरक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। यह कदम प्रतीकात्मक ही सही, लेकिन लोकतांत्रिक नैतिकता के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत में सांसदों और विधायकों को वेतन, भत्ता, यात्रा सुविधा, आवास और पेंशन जैसी अनेक सुविधाएं प्राप्त हैं। समय-समय पर इन सुविधाओं की समीक्षा की मांग उठती रही है। प्रश्न यह है कि क्या जनप्रतिनिधियों को एक कार्यकाल के बाद आजीवन पेंशन मिलनी चाहिए? क्या कई बार निर्वाचित होने पर बहु-पेंशन व्यवस्था न्यायोचित है? कुछ राज्यों में इस पर सुधारात्मक कदम उठाने की चर्चा हुई है। उदाहरण के लिए, गुजरात में विधायकों की पेंशन व्यवस्था को सीमित करने की पहल की गई थी। ऐसे प्रयास यह संकेत देते हैं कि लोकतंत्र में आत्ममंथन संभव है।
राजनीति यदि जनसेवा है, तो सादगी उसका स्वाभाविक गुण होना चाहिए। फिर प्रश्न उठता है कि वेतन-भत्तों और विशेषाधिकारों की सीमा क्या होनी चाहिए? क्या जनप्रतिनिधियों को केवल पारिवारिक गुजारे भर की व्यवस्था तक सीमित रहना चाहिए? यह विचार विवादास्पद हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक विमर्श का विषय अवश्य है। संसद राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर बहस का सर्वोच्च मंच है। विदेशी समझौते, आर्थिक नीतियां, सुरक्षा और सामाजिक न्याय—इन पर खुली चर्चा लोकतंत्र की आत्मा है। समय-समय पर विभिन्न नेताओं द्वारा अंतरराष्ट्रीय विवादों, तथाकथित एपस्टीन फ़ाइल या अन्य संवेदनशील मामलों का उल्लेख किया जाता रहा है। हालांकि, इन विषयों पर अनेक दावे अपुष्ट या विवादित हैं, इसलिए तथ्य-आधारित और आधिकारिक जानकारी पर आधारित चर्चा ही लोकतांत्रिक मर्यादा के अनुरूप मानी जाएगी। पारदर्शिता की मांग भी इसी संदर्भ में उठती है। जब सार्वजनिक धन से योजनाएं और कोष संचालित होते हैं, तो जनता स्वाभाविक रूप से जवाबदेही चाहती है। चाहे वह कोई भी फंड हो या सरकारी निर्णय—विश्वास तभी मजबूत होगा जब पारदर्शिता स्पष्ट और सुलभ हो। वीआईपी संस्कृति, सुरक्षा काफिले और विशेषाधिकारों पर भी अक्सर प्रश्न उठते हैं। सुरक्षा व्यवस्था कई बार वास्तविक खतरों के कारण आवश्यक होती है, लेकिन उसका संतुलन और औचित्य सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। लोकतंत्र की भावना यही है कि जनप्रतिनिधि जनता से दूर नहीं, बल्कि उसके बीच हों। जब राजनीति सेवा की बजाय सुविधा का पर्याय बनती दिखाई देती है, तब जनविश्वास कमजोर पड़ता है। इसलिए आवश्यक है कि प्रतिनिधि स्वयं सादगी, संयम और नैतिकता का उदाहरण प्रस्तुत करें। श्रीलंका का हालिया निर्णय एक उदाहरण के रूप में सामने आया है, पर हर देश की परिस्थितियां अलग होती हैं। भारत में भी इस विषय पर व्यापक, संतुलित और तथ्य-आधारित बहस की आवश्यकता है। राजनीति का उद्देश्य यदि जनकल्याण है, तो वेतन-भत्तों और पेंशन पर पुनर्विचार कोई असंभव कदम नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च है। जनप्रतिनिधियों की विश्वसनीयता तभी सुदृढ़ होगी, जब वे स्वयं को विशेषाधिकारों से ऊपर उठाकर सेवा, पारदर्शिता और जवाबदेही को प्राथमिकता देंगे। राजनीति को पेशा नहीं, दायित्व समझा जाए—यही किसी भी लोकतंत्र की स्थायी शक्ति है।




