Sunday, March 29, 2026
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संपादकीय: अपने ही जाल में फंसे ट्रंप ?

एपस्टीन फाइल बाहर आने पर ट्रंप ने बहाने से कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा, इजरायल के साथ मिलकर हमला कर दिया। भले ही अयातुल्लाह खोमैनी क्रूर रहे हों, अपने ही लोगों के साथ ज्यादतियां किए हों, उनकी हत्या के साथ वह अध्याय दफ्न हो गया। नागरिकों का गुस्सा अब अमेरिका पर आ गया। अयातुल्लाह के राजनीतिक विरोधी भी अब खुलकर मुल्क ईरान के पक्ष में उठ खड़े हो गए। एपस्टीन फाइल के भूत ने ट्रंप को लाकर ईरान में फंसा दिया। अब ट्रंप के पास इस व्यूह से निकलने की कोई रणनीति ही नहीं रही। ट्रंप ने सोचा था, जैसे उनके पूर्ववर्तियों ने जापान पर परमाणु बम गिराए थे, कोरिया को बांट दिया, अफगानिस्तान, इराक को बर्बाद किया, वियतनाम को तहस-नहस किया, चिली, उरुग्वे, ब्राजील, पैराग्वे और अर्जेंटीना को बर्बादी के कगार पर ला दिया था, तालिबान और आईएसआईएस खड़ा किया, वैसी ही चाल ईरान में चलना चाहते थे।
सोचा था, इजरायल और अमेरिका मिलकर दो-चार दिनों में घुटनों पर ला देंगे, लेकिन हुआ उल्टा। अमेरिकी सीनेटर क्रिस बैन हेलन ने प्रतिक्रिया देते हुए ट्रंप पर वार किया। कहा, नेतन्याहू चालीस साल तक इंतजार करता रहा कि अमेरिका में कोई ट्रंप जैसा मूर्ख राष्ट्रपति बने। एक मीटिंग में सबमरीन सेना ने कहा, हम ईरान में युद्ध लड़ना नहीं चाहते, फिर ट्रंप के लोगों ने बाहर ले जाकर उसके हाथ ही तोड़ दिए। फेड चेयरमैन पावेल के अनुसार अमेरिका में महंगाई बढ़ेगी। 35 करोड़ अमेरिकी जनता इस महंगाई की मार झेलेगी। यह सब ट्रंप द्वारा एपस्टीन फाइल में वीडियो आने के कारण बचने के लिए किया गया। बिजली, तेल सब कुछ महंगा हो जाएगा। जो कैंट ने पत्रकारों के सवाल के जवाब में कहा, मैं ईमानदारी से अपने युवाओं को विदेशी युद्ध क्षेत्र में मरने के लिए नहीं भेज सकता, हमारे नेताओं को पता होना चाहिए कि हम युद्ध का समर्थन नहीं कर सकते। पूर्व सीआईए चीफ लियोन पेनेटा ने ईरान युद्ध के लिए ट्रंप को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि अमेरिका के पास इस जंग से निकलने की कोई स्पष्ट रणनीति ही नहीं है। हॉर्मूज जलडमरूमध्य बंद होने से वैश्विक तेल संकट गहरा गया है। साथ ही इस कार्रवाई से ईरान का नेतृत्व कमजोर पड़ने की जगह और मजबूत हो गया है। यहां तक कि ट्रंप के खास मंत्री क्रिस्टोफर लेंडी, जो भारत की धरती पर खड़े होकर चीन को चेतावनी देता है, उससे भारतीय नेतृत्व के कमजोर होने का संकेत माना जा सकता है। दूसरी ओर अमेरिका अपने भारी नुकसान के कारण अब खाड़ी देशों, कतर, बहरीन, इराक, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात, सीरिया जैसे देशों से अपने सैन्य अड्डे समेटने की तैयारी में दिख रहा है। यह संकेत है कि स्थिति अमेरिका के पक्ष में नहीं रही। ट्रंप ने नाटो राष्ट्रों से मदद की गुहार लगाई, लेकिन हर जगह आलोचना ही मिली। स्पेन के प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा कि हम ऐसे व्यक्ति का समर्थन नहीं कर सकते, जो खुद को दुनिया का मालिक समझता हो। ब्राजील के राष्ट्रपति ने भी संप्रभुता के सम्मान की बात कही। स्पेन के परिवहन मंत्री ने नेतन्याहू के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी। सारी दुनिया में इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू की नीतियों की आलोचना हो रही है। एक चीनी स्कॉलर ने भी कहा कि आतंकवादियों को निशाना बनाना अलग बात है, लेकिन हजारों बच्चों की मौत ने नैतिक सवाल खड़े कर दिए हैं। इतिहास गवाह है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इजरायल को फिलिस्तीन मुद्दे पर कड़ी बात कही थी। आज भी वही प्रश्न खड़ा है कि क्या सैन्य शक्ति के बल पर स्थायी समाधान संभव है। रिपोर्टों में इजरायल की कुछ गंभीर करतूतों के आरोप भी सामने आए हैं, जिनमें अमानवीय व्यवहार की बातें कही गई हैं। युद्ध के दौरान मासूमों पर अत्याचार की खबरें मानवता को झकझोरती हैं। दूसरी ओर, ईरान के भीतर सामाजिक एकजुटता के उदाहरण भी सामने आए हैं, जहां दुकानदारों ने जरूरतमंदों के लिए मुफ्त सामान तक उपलब्ध कराया। यह दर्शाता है कि संकट के समय समाज किस तरह संगठित हो सकता है। अंततः प्रश्न यही है कि क्या कोई भी महाशक्ति ऐसे देश को पराजित कर सकती है, जहां जनता के भीतर एकता और आत्मबल मजबूत हो। इतिहास बताता है कि केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि जनसमर्थन और नैतिक आधार से ही स्थायी विजय संभव होती है।

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