Wednesday, February 4, 2026
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संपादकीय: चीन, चुप्पी और सरकार!

स्मरण होगा, चंद दिनों पूर्व चीनी राजनीतिक पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच बीजेपी मुख्यालय में गोपनीय बातें और मुलाक़ात हुई। दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई ने कहा था, चीन हमारा पुराना शत्रु है। पाकिस्तान को तो हम जब चाहें धूल चटा सकते हैं। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने जब भारत पर रूस से तेल लेने के नाते 25 प्रतिशत अधिक टैरिफ की घोषणा की तो प्रधानमंत्री तुरंत चीन में होने वाली बैठक में गए, जहां वे चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग से हाथ मिलाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया था, तब जिनपिंग ने आगे बढ़ने का इशारा किया। मजबूर मोदी जी को अपमानित होकर आगे जाना पड़ा था। पाकिस्तान के साथ शारजाह में क्रिकेट खेल सकते हैं, परंतु पाकिस्तानी खिलाड़ी से हाथ नहीं मिला सकते। बड़े गर्व से कहा गया कि हमारे खिलाड़ी पाकिस्तानी क्रिकेटरों से हाथ नहीं मिलाया। कुछ ऐसा ही भाव जिनपिंग का रहा होगा। बहुत समय से कहा जा रहा है चीन हमारे अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा कर कई नाम बदले। लद्दाख के चरवाहों ने बताया था कि जहां उनकी भेड़-बकरियां चराई जाती थीं, अब वहां जाने से चीनी सेना मना करती है। अगर यह सच है तो बेहद चिंता का विषय है।
राहुल गांधी पर चीनी राजदूत से मिलने पर बीजेपी तंज कसती रही थी, लेकिन बीजेपी मुख्यालय में चीन की राजनीतिक पार्टी के साथ मुलाकात के क्या मायने हो सकते हैं? चीन के साथ हमारा पुराना विवाद रहा है, जब चीन ने हिंदी-चीनी भाई-भाई कहते हुए हमारी पीठ में छुरा घोंपा और हजारों वर्ग किलोमीटर हमारी भूमि पर कब्जा जमा लिया था। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते मोदी ने कहा था कि लाल आंखें दिखानी चाहिए थीं। तब भारत मजबूर था, कमजोर था, इसलिए लाल आंखें दिखाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था। लेकिन आज तो भारत सुरक्षित हाथों में मजबूत बताया जाता है, फिर क्यों लाल आंखें नहीं दिखाता? चीन के साथ सीमा विवाद हमेशा रहा है। साम्राज्यवादी चीन शक्तिशाली बन चुका है। फिर जब बीजेपी चीनी पदाधिकारियों के साथ मुख्यालय में गुफ्तगू कर रहा था, ठीक उसी समय चीन भारतीय भूमि को अपना होने का दावा क्यों और किस अधिकार से कर रहा था? चीन की नीति है अंगुल-अंगुल पड़ोसी राष्ट्रों की भूमि पर कब्जा जमाना। दोकलाम और गलवान घाटी में चीनी सेना के साथ भारतीय सेना की झड़प हो चुकी है। गलवान घाटी में हमारे बीस जवान मारे गए थे। पूर्व जनरल आर्मी चीफ नरवरे ने अपनी किताब में लिखा है, जो वर्षों से प्रकाशित होने के लिए सरकार की अनुमति के लिए दबा कर रखी गई है। निश्चित ही सरकारी लोग इस पांडुलिपि को पढ़ चुके होंगे, जिसमें नरवरे ने प्रधानमंत्री मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से आज्ञा मांगी थी ताकि चीनी सेना द्वारा हो रही घुसपैठ को रोका जा सके। लेकिन आज्ञा नहीं दी गई। जैसे ऑपरेशन सिंदूर के समय सरकार और गोदी मीडिया ने बड़ा शोर किया था कि मोदी ने सेना को खुली छूट दे दी है कि स्थान और समय सेना तय करे, लेकिन यह प्रचार सफेद झूठ निकला, क्योंकि खुद आर्मी चीफ ने सिंगापुर में कहा था, सरकार झूठ बोल रही है। हमें खुली छूट नहीं दी गई थी, बल्कि पाकिस्तानी सेना पर हमला करने की सख्त मनाही थी। यही नहीं, सेना जब शौर्य दिखा रही थी तब सरकार पाकिस्तानी आईएसआई चीफ को खुफिया जानकारी दी जा रही थी कि हमारी सेना आतंकवादियों और उनके अड्डे तबाह करने के लिए ऑपरेशन सिंदूर चला रही है। पाकिस्तान को सचेत करना सरकार का ब्लंडर था, क्योंकि हमारे कई विमान मार गिराने का दावा पाकिस्तान करने लगा था। आर्मी चीफ रहे नरवरे ने जो किताब लिखी है, उसकी प्रमुख घटनाएं अखबार और पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा करते समय नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने देश की सिक्योरिटी पर सवाल उठाते हुए नरवरे की अप्रकाशित पुस्तक के अंश बोलने लगे थे। संसद में पीएम मोदी विदेशी लेखक को कोट करते थे। बीजेपी के नेता भी कई बार किताबों में लिखी बातों को कोट करते रहे हैं, क्योंकि उसमें बीजेपी को फायदा दिखता रहा। लेकिन जब भारतीय सेनाध्यक्ष की पुस्तक से कोट किया गया तो गृहमंत्री, रक्षामंत्री ही नहीं, खुद स्पीकर भी राहुल गांधी को संसद का कानून बताने लगे। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने जब राहुल गांधी का समर्थन किया तो स्पीकर ने उनकी माइक ही बंद कर दी। क्या निष्पक्ष हैं स्पीकर या बीजेपी के अधिकारी? कम से कम स्पीकर पद की मर्यादा का ख्याल रखते। जो कानून सत्ता पक्ष पर लागू नहीं होता, वह विपक्ष पर क्यों थोपा जाता है? नरवरे ने जब सरकार से अनुमति मांगी थी तब उन्हें अनुमति क्यों नहीं दी गई? किताब में लिखा चूंकि बीजेपी सरकार को कटघरे में खड़ा करता है, इसलिए सारे कानून लागू किए जाना लोकतंत्र का अपमान नहीं तो क्या है? जब सेना ने सरकार से एयरलिफ्ट कराने के लिए हवाई जहाज मांगे थे, तब पांच महीने तक फाइल गृहमंत्रालय ने दबा कर रखी थी। मजबूरन रोड मार्ग से सेना को जाना पड़ा और देश के चालीस वीर सैनिकों को अपने प्राण कुर्बान करने पड़े थे। पहलगाम हमले के दो दिन पूर्व वहां से सुरक्षा हटा ली गई, जिससे 26 महिलाओं का सिंदूर उजड़ गया था। आज तक इतना अधिक आरडीएक्स कहां से आया, इसका पता नहीं लगा सकी सरकार। चीन के मामले में सरकार चुप हो जाती है।
भले ही सेनाध्यक्ष नरवरे की किताब सरकार ने प्रकाशित नहीं होने दी हो, लेकिन उसके कई अंश पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं, जिस पर कभी सेनाध्यक्ष ने असहमति नहीं जताई। नरवरे के अनुसार किताब का प्रकाशित होना प्रकाशक और सरकार के बीच का मामला है। आखिर क्यों रोका गया राहुल गांधी को सच कहने से? शायद सरकार को सच हजम नहीं हो पाता।
हजारों वर्ष पूर्व वेद, शास्त्र, उपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता, महाभारत, रामायण, वैमानिक शास्त्रम, पतंजलि महाभाष्य जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें ताड़ पत्रों आदि पर लिखी गई थीं। रामचरितमानस तुलसीदास ने कई बार लिखी और प्रेमियों में वितरित की। वाराणसी संस्कृत विश्वविद्यालय में हजारों पांडुलिपियां रखी गई हैं। शोध छात्र उन पर पीएचडी करते रहते हैं। उन्हें डिग्रियां भी दी जाती हैं। अप्रकाशित पांडुलिपियों को प्रामाणिक माना जाता है। उन्हीं का मैक्स मूलर अनुवाद करता है। तब नरवरे जो अनुशासित सेनाध्यक्ष रहे हैं, उनकी किताब छापने की अनुमति अभी तक नहीं दी गई सरकार द्वारा, तो क्या उनकी पुस्तक को प्रामाणिक नहीं माना जा सकता? सेना अनुशासित होती है, इसीलिए नरवरे की किताब डिजिटल रूप में बाजार में उपलब्ध नहीं है। अगर अनुशासन नहीं होता तो अब तक डिजिटल कर दी जाती। संभव है सत्ता में रहते बीजेपी कभी भी अनुमति न दे, लेकिन जिस दिन सत्ता से हटेगी तब अनुमति मिल जाएगी। उस समय इतिहास क्या लिखेगा?

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