
सरकारें वोट बैंक की राजनीति के लिए कितना नीचे जा सकती हैं, इसकी कोई स्पष्ट सीमा दिखाई नहीं देती। डॉक्टर को धरती का भगवान कहा जाता है, क्योंकि उसके हाथों में सीधे तौर पर जीवन और मृत्यु का प्रश्न होता है। ऐसे में यदि योग्यता के न्यूनतम मानकों को शिथिल कर दिया जाए, तो इसका परिणाम कितना गंभीर हो सकता है, यह समझना कठिन नहीं है। चिकित्सा कोई सामान्य पेशा नहीं, बल्कि अत्यंत विशेषज्ञता और उच्च ज्ञान की मांग करने वाला क्षेत्र है। यदि ऐसे अभ्यर्थियों को स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रमों (एमडी/एमएस) में प्रवेश दिया जाए, जिनके अंक अत्यंत कम हों, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि विशेषज्ञता कैसे सुनिश्चित की जाएगी? सरकारी अस्पतालों — जिनमें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान जैसे संस्थान भी शामिल हैं — में तो सर्वोच्च स्तर की चिकित्सा अपेक्षित होती है। चिंता इस बात की है कि यदि योग्यता के मानकों में अत्यधिक ढील दी जाती है, तो इसका सबसे बड़ा प्रभाव उन 80 प्रतिशत गरीब परिवारों पर पड़ेगा, जो जिला, मंडल और ब्लॉक स्तर के सरकारी अस्पतालों पर निर्भर रहते हैं। चिकित्सा शिक्षा में न्यूनतम दक्षता अनिवार्य होनी चाहिए, क्योंकि कमज़ोर प्रशिक्षण का सीधा असर मरीज की जान पर पड़ सकता है। हाल के वर्षों में नीट-पीजी की कुछ सीटें खाली रहने और कट-ऑफ में कमी को लेकर बहस तेज हुई है। इसी संदर्भ में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा की पात्रता अंक प्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं। यदि किसी परीक्षा में 800 अंकों में अत्यंत कम स्कोर वाले अभ्यर्थियों को भी पात्र घोषित किया जाता है, तो यह स्वाभाविक है कि चिकित्सा समुदाय और आम जनता दोनों में चिंता उत्पन्न होगी। कई चिकित्सक संगठनों, जिनमें इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भी शामिल है, ने गुणवत्ता मानकों को लेकर सवाल उठाए हैं। यह मुद्दा न्यायिक स्तर तक पहुंच चुका है और सुप्रीम कोर्ट में इस पर सुनवाई चल रही है। ऐसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि उसका निर्णय न केवल वर्तमान व्यवस्था बल्कि भविष्य की चिकित्सा गुणवत्ता को भी प्रभावित करेगा। यह भी सच है कि भारत में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है, विशेषकर सरकारी अस्पतालों में। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या रिक्त पद भरने के लिए गुणवत्ता से समझौता किया जाना चाहिए? सामान्य परीक्षाओं में भी 33 से 38 प्रतिशत तक अंक प्राप्त करना न्यूनतम उत्तीर्ण मानक होता है। ऐसे में चिकित्सा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में न्यूनतम दक्षता सुनिश्चित करना और भी आवश्यक हो जाता है। आरक्षण नीति सामाजिक न्याय का उपकरण है, लेकिन किसी भी नीति का उद्देश्य गुणवत्ता को नष्ट करना नहीं होना चाहिए। यदि प्रवेश मानकों में अत्यधिक कमी लाई जाती है, तो इसका दुष्परिणाम अंततः गरीब और वंचित वर्ग ही भुगतेगा, जो सरकारी अस्पतालों पर निर्भर है। देश के सामने दोहरी चुनौती है- एक ओर सामाजिक समावेशन सुनिश्चित करना, दूसरी ओर चिकित्सा की गुणवत्ता को बनाए रखना। समाधान संतुलन में है: पर्याप्त प्रशिक्षण, पारदर्शी मूल्यांकन, कठोर परीक्षा प्रणाली और न्यूनतम योग्यता का स्पष्ट मानक। सुप्रीम कोर्ट से अपेक्षा है कि वह इस विषय पर निर्णय लेते समय केवल कानूनी पहलुओं को ही नहीं, बल्कि मानवीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य के व्यापक दृष्टिकोण को भी ध्यान में रखे। चिकित्सा शिक्षा में किसी भी प्रकार का समझौता सीधे तौर पर जन-जीवन से जुड़ा प्रश्न है। लोकतंत्र में जनता का विश्वास सर्वोपरि होता है। यदि स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं, तो उसका प्रभाव केवल सरकार पर नहीं, बल्कि पूरी संस्थागत व्यवस्था पर पड़ता है। इसलिए आवश्यक है कि चिकित्सा शिक्षा और नियुक्तियों में पारदर्शिता, योग्यता और जिम्मेदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।




