
अमेरिका जो खुद को सबसे बड़ा पॉवर आर्थिक और सामरिक शक्ति मानता है, वह भारत का कभी हित नहीं चाहता। अमेरिका नहीं चाहता कि भारत आर्थिक और सैन्य शक्ति विकसित करे। अमेरिका भारत को बार-बार दबाव में रखना चाहता है। इसका प्रमाण खुद अमेरिका के उप विदेशमंत्री क्रिस्टोफ़र लेडी ने रायसीना डायलॉग, दिल्ली में स्पष्ट रूप से कहा कि अमेरिका अब भारत के साथ वैसी गलती नहीं दोहराएगा जो उसने लगभग बीस साल पूर्व चीन के साथ की थी। चीन को बिना पारस्परिक के बाजार में बड़ी छूट देकर अमेरिका ने चीन को आर्थिक प्रतिद्वंद्वी बनने दिया था। यह बात व्यापार समझौते (ट्रेड डील) और अमेरिका-भारत संदर्भ में कही थी, जहाँ अमेरिका अपने हितों को प्राथमिकता देना चाहता है और भारत को चीन जैसा अनियंत्रित आर्थिक लाभ नहीं देना चाहता। सच तो यह है कि अमेरिका हमेशा से भारत की तरक्की में रोड़ा बनता रहा है। भाभा एटोमिक एनर्जी के अध्यक्ष डॉ. जहांगीर होमी भाभा की प्लेन क्रैश में संदिग्ध मृत्यु हो या “जय जवान जय किसान” का नारा देकर भारत को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास करने वाले दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रूस में पाकिस्तान समझौते के बाद संदेहास्पद मृत्यु, जिसमें उनका शरीर नीला पड़ गया था और जिनका पोस्टमार्टम तक नहीं होने दिया गया। दोनों मृत्यु में अमेरिकी साजिश मानी जाती है। इसके अलावा अमेरिका हमेशा भारत के चिर शत्रु पाकिस्तान का पक्ष लेता रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद लाखों डॉलर की आर्थिक सहायता के रूप में यह भारत विरोध देखा जा सकता है। वास्तविकता यही है कि अमेरिका नहीं चाहता कि भारत कभी भी विश्व की आर्थिक और सामरिक शक्ति बनकर उभरे और उससे प्रतिद्वंदिता करे, जैसे आज चीन कर रहा है। अमेरिका द्वारा भारत विरोध या उसका रुख खासकर शीत युद्ध के दौरान और उसके बाद दशकों तक पाकिस्तान का समर्थन, परमाणु कार्यक्रम पर असहमति, क्षेत्रीय युद्धों में पक्ष लेने और व्यापार प्रतिबंधों से जूझता रहा है भारत। अगर इतिहास पर नजर डालें तो 1961 में गोवा मुक्ति के समय, क्योंकि भारत ने पुर्तगाली उपनिवेश गोवा पर कब्जा कर लिया था, कैनेडी प्रशासन ने भारत की कड़ी निंदा की थी और भारतीय सेना को तुरंत वापस बुलाने की मांग की थी। यही नहीं, अमेरिका ने भारत को विदेशी सहायता में 25 प्रतिशत कटौती कर दी थी। दूसरा मौका 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में आया, जब सीटो और सेंटो के तहत पाकिस्तान को हथियार दिए गए थे, जबकि भारत पर दबाव बनाया गया। युद्ध के दौरान अमेरिका ने दोनों देशों पर हथियार आपूर्ति रोक दी, लेकिन पाकिस्तान को पहले से मिले हथियारों, जिनमें पैटन टैंक भी शामिल थे, का उसे फायदा मिला। फिर आया 1971 का समय, जब बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मुजीबुर्रहमान के समर्थकों पर पाकिस्तानी शासन द्वारा किए जा रहे नरसंहार को रोकने के लिए भारतीय सेना भेजी थी। तब निक्सन-किसिंजर प्रशासन ने पाकिस्तान का खुला समर्थन ही नहीं किया था, बल्कि भारत को डराने के लिए परमाणु शक्ति से लैस अपना सातवां बेड़ा भी भेज दिया था। इंदिरा गांधी ने तब अमेरिका को ललकारते हुए कहा था कि सातवां नहीं, सत्तरवां बेड़ा भेज दो, भारत रुकने वाला नहीं है। इंदिरा ने तब रूस से मदद मांगी और रूस ने अपने युद्धपोत भेजकर सातवें बेड़े का रास्ता रोक लिया था। यही नहीं, संयुक्त राष्ट्र में भी भारत के पक्ष का समर्थन किया गया। इसके बाद 1974 में भारत ने पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण किया। तब अमेरिका ने कड़ी निंदा की, इसे गैर जिम्मेदाराना कहा और विश्व बैंक तथा आईएमएफ़ से कर्ज रोक दिया। भारत के निर्यात पर नियंत्रण किया गया और यह प्रतिबंध 2001 तक चला। अमेरिका ने विरोध करते हुए अपना राजदूत वापस बुला लिया, लेकिन भारत ने अपना रुख नहीं बदला। इसके पूर्व लाल बहादुर शास्त्री के समय अमेरिका ने भारत को गेहूं देने से मना कर दिया था। फिर भी शास्त्री झुके नहीं। “जय जवान जय किसान” का नारा देकर भारत को स्वावलंबी बनाने की दिशा में कदम आगे बढ़ाया। अमेरिका ने तारापुर परमाणु संयंत्र के लिए ईंधन देने से भी मना कर दिया, जबकि भारत परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण कार्यों के लिए चला रहा था। यह घटना 1970-80 के दशक की है। हाल के वर्षों में रूस से तेल खरीदने पर ट्रंप ने 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया। एस-400 खरीद पर कोस्टा प्रतिबंध लगाने की बात 2025-26 में सामने आई। हाल में ही अमेरिका ने एकतरफा ट्रेड डील भारत पर थोप दी, जिसके अनुसार अमेरिकी कृषि उत्पाद भारत को निर्यात किए जाएंगे। अमेरिका अपने किसानों को 100 प्रतिशत सब्सिडी देता है, जबकि भारत में महंगे बीज, खाद और कीटनाशक बेचे जाते हैं। किसानों को एमएसपी के लिए दो वर्ष तक धरना देने को मजबूर होना पड़ा। सरकार ने वादा किया, लेकिन पीछे हट गई। ऐसे में भारतीय किसान अमेरिकी किसानों के सामने कैसे टिक पाएंगे? इसका भारी विरोध भारत के विपक्षी नेता कर रहे हैं, लेकिन सरकार के कानों में जूं नहीं रेंग रही। ऐप्सटीन फ़ाइल्स में ट्रंप द्वारा तेरह साल की बच्ची के साथ अमानवीय दुर्व्यवहार के मामले में अमेरिका में मुकदमा चलाने की तैयारी है। शायद यही कारण है कि ट्रंप ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला कर दिया, जिसमें हजारों स्कूली छात्राएं मारी गईं। ईरान युद्ध से पीछे नहीं हटना चाहता, तो दूसरी तरफ ट्रंप पर अमेरिकी जनता का दबाव पड़ रहा है। वहाँ के लोग विदेशी धरती पर अमेरिकी सैनिकों की मृत्यु और उनके शव देखना नहीं चाहते। बड़ी बेशर्मी की बात है कि अमेरिकी पनडुब्बी ने टॉरपीडो से निहत्थे ईरानी नाविकों से भरे जहाज को श्रीलंका के पास हिंद महासागर में डुबो दिया, जो भारत में युद्ध अभ्यास के लिए आए थे और भारत के मेहमान थे। अमेरिका ने भारत-ईरान में कटुता बढ़ाने के लिए ही यह हमला किया। भारत यूरोप से व्यापार करने के लिए ईरान के चाबहार बंदरगाह के निर्माण में हजारों करोड़ रुपए खर्च कर चुका है, ताकि पाकिस्तानी जमीन के बिना ही यूरोपीय राष्ट्रों के साथ व्यापार कर सके। अब अमेरिका की कुदृष्टि चाबहार बंदरगाह पर है, जहाँ से वह पाकिस्तान में चीन द्वारा निर्मित ग्वादर बंदरगाह को घेर सके। सच तो यह है कि अमेरिका नहीं चाहता कि भारत यूरोप के साथ व्यापार कर अपनी अर्थव्यवस्था बढ़ा सके। अमेरिकी दादागिरी का हाल यह है कि भारत उसकी मर्जी के बिना तेल भी नहीं खरीद सकता। अब उसने भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए तीस दिन की मोहलत दी है। इसे क्या समझा जाना चाहिए? क्या भारत अमेरिकी उपनिवेश बन गया है? अमेरिकी मर्जी के बिना भारत क्या सांस भी नहीं ले पाएगा? सच तो यह है कि भारत ने अपनी निर्गुट विदेश नीति छोड़कर अमेरिकी ध्रुव नीति पर चलना शुरू कर दिया है। यह जानते हुए भी कि अमेरिका भारत का प्रभाव बढ़ने देना नहीं चाहता, फिर भी भारत सरकार अमेरिका के सामने नतमस्तक हो चुकी है। अमेरिकी गुट के साथ होने के कारण भारत का अभिन्न मित्र और सहयोगी रूस का नाराज़ होना स्वाभाविक है। इसलिए उसने भारत को सस्ता तेल देने से मना कर दिया है।




