Tuesday, January 13, 2026
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परिस्थितियों से नहीं परिणामों से परखे जा रहे हैं डॉ.मोहन यादव

पवन वर्मा
ग्वालियर में 25 दिसंबर को आयोजित हुआ अभ्युदय मध्य प्रदेश ग्रोथ समिट 2025 का मंच औपचारिक भाषणों, निवेश प्रस्तावों और आंकड़ों के प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा। यह मंच दरअसल भारतीय जनता पार्टी की सत्ता-राजनीति के एक महत्वपूर्ण संदेश का केंद्र बन गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यहां भाषण में जिस भाषा, जिस संदर्भ और जिस आत्मविश्वास के साथ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का उल्लेख किया, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि यह आयोजन केवल निवेश आकर्षित करने का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि मध्यप्रदेश के नेतृत्व की नई परिभाषा गढ़ने का अवसर भी था। शाह ने मोहन यादव के काम को सराहते हुए उन्हें राष्ट्रीय कसौटी पर खड़ा कर दिया है। अमित शाह ने मंच से यह नहीं कहा कि मध्यप्रदेश सरकार अच्छा काम कर रही है या राज्य सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने इससे एक कदम आगे जाकर कहा कि मोहन यादव के रीजनल समिट का मॉडल अब सभी राज्यों तक पहुंचाया जाएगा। राजनीति की भाषा में यह साधारण वाक्य नहीं है। यह किसी एक योजना या कार्यक्रम की प्रशंसा नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री की कार्यशैली और सोच को राष्ट्रीय मानक घोषित करने जैसा है। जिस क्षण किसी राज्य का मॉडल पूरे देश के लिए उदाहरण बना दिया जाता है, उसी क्षण उस राज्य के मुख्यमंत्री की प्रदेश की बेहतरी की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती हैं। इस बयान के साथ मोहन यादव केवल मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं रह जाते, बल्कि वे उस नीति और प्रशासनिक ढांचे का चेहरा बन जाते हैं, जिसकी तुलना अब दूसरे राज्यों से की जाएगी। अब हर रीजनल समिट, हर निवेश बैठक और हर उद्योगिक निर्णय केवल राज्य स्तर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी उल्लेखित होगा। अमित शाह ने जानबूझकर यह नहीं कहा कि मध्यप्रदेश अच्छा कर रहा है, बल्कि यह कहा कि मोहन यादव का मॉडल देश अपनाएगा। इस सूक्ष्म अंतर में ही पूरी राजनीति छिपी है। शाह के भाषण का दूसरा अहम पहलू शिवराज सिंह चौहान से की गई तुलना थी। उन्होंने कहा कि शिवराज के समय यह प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन मोहन यादव उससे अधिक ऊर्जा के साथ काम कर रहे हैं। सतही तौर पर यह बयान तारीफ जैसा लगता है, लेकिन भाजपा की आंतरिक राजनीति में इसका अर्थ कहीं अधिक गहरा है। शिवराज सिंह चौहान केवल एक पूर्व मुख्यमंत्री नहीं हैं, वे पार्टी के भीतर एक लंबे समय तक मध्य प्रदेश का चेहरा रहे हैं। उनसे अधिक ऊर्जा की बात करना मोहन यादव को सीधे-सीधे उनके समकक्ष खड़ा करना है। ग्वालियर के मंच से दिया गया तीसरा बड़ा संदेश था कि गुटबाजी के बीच नेतृत्व की स्पष्टता। मध्यप्रदेश भाजपा पिछले कुछ समय से अंदरूनी खींचतान और गुटीय राजनीति से अछूती नहीं रही है। सिंधिया समर्थक, तोमर समर्थक, शिवराज समर्थक और संगठन के अलग-अलग धड़े,यह सच्चाई किसी से छिपी नहीं है। ऐसे वातावरण में अमित शाह ने मंच से संकेत दिया कि केंद्रीय नेतृत्व मोहन यादव के साथ खड़ा है। मध्यप्रदेश की राजनीति में यह वाक्य जितना सरल है, उतना ही निर्णायक भी।
इस समर्थन का मतलब यह है कि पार्टी के भीतर अब मुख्यमंत्री के अधिकार और नेतृत्व को लेकर कोई अस्पष्टता नहीं रहेगी। जब केंद्र सार्वजनिक रूप से किसी मुख्यमंत्री के साथ खड़ा होता है, तो यह संदेश माना जाता है कि पूरा समर्थन है, और अब पूरे परिणाम चाहिए। अमित शाह की राजनीति की विशेषता यही है कि वे किसी नेता को हटाकर नहीं, बल्कि अपेक्षाओं के भार से बांधकर नियंत्रित करते हैं। ग्वालियर में दिया गया बयान इसी रणनीति का हिस्सा है। मोहन यादव को वैधता, संरक्षण और प्रतिष्ठा तीनों एक साथ दी गई। लेकिन उसी क्षण यह भी तय हो गया कि अब उनकी पहचान परिस्थितियों से नहीं, बल्कि परिणामों से हो रही है। अंतत: ग्वालियर का मंच मोहन यादव के लिए प्रशंसा का मंच नहीं, बल्कि प्रतिबद्धता का मंच था।

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