
अनिल गलगली
सूचना अधिकार कार्यकर्ता
मुंबई। मुंबई महानगरपालिका के चुनाव 15 जनवरी 2026 को संपन्न हुए और 16 जनवरी को परिणाम घोषित कर दिए गए। लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पहला चरण पूरा हो चुका था। लेकिन लोकतंत्र का दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण चरण था सत्ता का त्वरित हस्तांतरण जो यहीं आकर धीमा पड़ गया। महापौर का चुनाव 11 फरवरी 2026 को तय किया गया, यानी चुनाव परिणामों के बाद पूरे 26 दिनों की देरी। यह देरी केवल एक प्रशासनिक संयोग है या सत्ता की सुविधा के लिए की गई रणनीति, यह सवाल आज पूरे शहर में गूंज रहा है। मुंबई महानगरपालिका अधिनियम, 1888 में यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया है कि महापौर का चुनाव कितने दिनों के भीतर होना चाहिए। हालांकि, यह अनिवार्य है कि पहली आम सभा अनावश्यक विलंब के बिना आयोजित की जाए। भले ही कानून में दिनों की स्पष्ट संख्या न हो, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा साफ कहती है कि जनता के फैसले को टालना नहीं चाहिए। कानून की खामियों का लाभ उठाना प्रशासन का कर्तव्य नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा करना उसकी जिम्मेदारी है। राज्य की अन्य महानगरपालिकाओं और नगरपालिकाओं में चुनाव परिणामों के 10 से 15 दिनों के भीतर महापौर के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। वहां भी कानून वही है, नियम वही हैं। फिर मुंबई के लिए अलग समय-सारणी क्यों? उत्तर स्पष्ट है कि मुंबई में लोकतंत्र से अधिक राजनीतिक गणित जटिल हैं। परिणामस्वरूप, चुने हुए नगरसेवक अधिकारविहीन रहते हैं और प्रशासक अधिक समय तक सत्ता में बने रहते हैं। जब निर्वाचित प्रतिनिधियों को निर्णय लेने का अधिकार नहीं मिलता और प्रशासनिक तंत्र को अतिरिक्त स्वायत्तता मिलती है, तो सवाल उठता है कि इसका लाभ किसे होता है? निश्चित रूप से जनता को नहीं। जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को अधिकार सौंपने में देरी करना, अप्रत्यक्ष रूप से लोकतंत्र को दरकिनार करने जैसा है। “महानगर बड़ा है”, “सुरक्षा का मुद्दा है”, “तैयारियों में समय लगता है” ये तर्क बार-बार दिए जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि यही कारण अन्य बड़े शहरों में बाधा क्यों नहीं बनते? क्या प्रशासन स्वतंत्र रूप से निर्णय ले रहा है या फिर सत्ताधारियों की सुविधा के अनुसार समय तय किया जा रहा है? इस पर संदेह होना स्वाभाविक है। महिला महापौर बनने की संभावना स्वागतयोग्य है। लेकिन यदि निर्णय प्रक्रिया ही समय पर न हो, तो ऐसी घोषणाओं का लोकतांत्रिक मूल्य क्या रह जाता है? प्रतिनिधित्व केवल नाम का नहीं, बल्कि समय पर अधिकार देने से सिद्ध होता है। 11 फरवरी 2026 की तारीख भले ही कानूनी दायरे में हो, लेकिन लोकतंत्र केवल कानून से नहीं चलता; वह नैतिकता, पारदर्शिता और समयबद्धता पर आधारित होता है। जो कानूनी है, वही हमेशा न्यायसंगत हो ऐसा आवश्यक नहीं।
यह मुद्दा केवल एक चुनाव तक सीमित नहीं है। भविष्य में क्या इसी तरह 40–50 दिनों तक देरी नहीं की जाएगी, इसकी गारंटी कौन देगा? इसलिए महापौर चुनाव के लिए कानून में स्पष्ट समय-सीमा (Time-limit) तय करना अत्यंत आवश्यक है। अन्यथा लोकतंत्र केवल कागज़ों तक सीमित रह जाएगा। मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है। यदि उसकी लोकतांत्रिक प्रक्रिया ही धीमी होगी, तो संदेश गलत जाएगा। मुंबईकरों ने अपना जनादेश दे दिया है। अब प्रशासन और सत्ताधारियों की जिम्मेदारी है कि वे इस जनादेश को समय पर, ईमानदारी से और पारदर्शी तरीके से लागू करें। लोकतंत्र सुविधा के अनुसार नहीं, बल्कि जनता के समय पर चलना चाहिए।




