
एक तरफ अमेरिकी ट्रंप ईरान युद्ध में उलझे हैं, हॉर्मूज दुनिया के गले की फांस बन गया है। अब न निगलते बनता है, न उगलते। भले दबाव बनाने के लिए ट्रंप ने ईरान के सामने तरह-तरह की शर्तें रख दी हैं, लेकिन ईरान उन्हें कभी नहीं मानेगा। स्वाभिमान बचाने हेतु वह इजरायल और अमेरिकी सेना से अकेले लड़ रहा है और भिड़ रहा है।
बड़बोले ट्रंप अब इज्जत बचाने के लिए कह रहे हैं कि लक्ष्य पा लिया, लेकिन सच यह है कि अमेरिका की बहुत अधिक क्षति हुई है, जिससे अमेरिका में महंगाई बढ़नी तय है। समूचे अमेरिकी राज्यों में ट्रंप के विरुद्ध जनता सड़कों पर उतरकर विरोध कर रही है। सीनेटर ही नहीं, नेवल फोर्स के मुखिया भी अपने जवानों को युद्ध में मरने भेजना नहीं चाहते।
पहले लगा था कि अमेरिका और इजरायल मिलकर ईरान को खत्म कर देंगे, लेकिन ईरानी चक्रव्यूह और सहयोगियों ने इजरायल को भारी नुकसान पहुंचाते हुए अमेरिकी बेस को भी निशाना बनाया। ट्रंप अब समझौते के लिए छटपटा रहे हैं। ईरान युद्ध से अमेरिकी जनता का ध्यान भटकाने के लिए अब ट्रंप चीन जाकर चंद हफ्तों में मिलने की तैयारी कर रहे हैं। इसी बीच चार सीनेटर ताइवान पहुंच गए, जिससे जिनपिंग कुपित हो गए। दरअसल ट्रंप पूरी एशिया में अपने मित्र देशों जापान, ताइवान, दक्षिण कोरिया को आश्वस्त करने की कोशिश में हैं। सांसदों की ताइवान यात्रा का जिनपिंग ने कड़ा विरोध किया है। संभव है कि जिनपिंग, ट्रंप वार्ता में ताइवान मुद्दे पर कूटनीतिक चाल चलकर अमेरिका को जवाब दें। ताइवान ने भले खुद को स्वतंत्र घोषित किया है, लेकिन चीन अभी भी उसे अपना हिस्सा मानता है। ट्रंप का यह दौरा ईरान में अपनी स्थिति से उपजी खीझ का परिणाम माना जा रहा है।
ईरानी परमाणु कार्यक्रम पर भी सवाल बना हुआ है। परिशोधित यूरेनियम का भंडार सामान्य बमबारी से प्रभावित नहीं होता, उसे केवल परमाणु हमले से ही नष्ट किया जा सकता है, लेकिन ट्रंप ऐसा जोखिम नहीं लेना चाहते, क्योंकि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनामी और बढ़ेगी। संयुक्त राष्ट्र में ईरानी प्रतिनिधि ने इस हमले को अपनी संप्रभुता पर हमला बताते हुए आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई को उचित ठहराया है, जिससे कूटनीतिक स्तर पर ईरान को बढ़त मिलती दिख रही है। अमेरिकी गुहार के बावजूद नाटो का कोई देश युद्ध में शामिल नहीं हुआ, बल्कि कई देशों ने अमेरिका और इजरायल को आक्रामक बताया। रूस-यूक्रेन युद्ध पहले से जारी है। यूक्रेन को डर है कि यदि अमेरिका ईरान में उलझा रहा, तो उसे मिलने वाली सैन्य सहायता प्रभावित होगी। ऐसे में वह अकेले रूस के सामने टिक नहीं पाएगा। अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने उम्मीद जताई है कि युद्ध समाप्त होने के बाद तेल के दाम स्थिर होंगे। लेकिन फिलहाल हॉर्मूज जलडमरूमध्य वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए संकट बना हुआ है, जिससे दुनिया भर में तेल और गैस की कीमतों में उथल-पुथल जारी है। अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते अब अमेरिका भी समझौते की मेज पर आने को मजबूर दिख रहा है। ईरान के साथ युद्ध ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाला है, जिससे वहां की जनता नाराज है और युद्ध समाप्त करने की मांग कर रही है। दुनिया भर में तेल संकट गहरा गया है। यदि हॉर्मूज मार्ग सामान्य होता है, तब भी तेल-गैस आपूर्ति सामान्य होने में कम से कम छह महीने का समय लग सकता है। एक बात स्पष्ट हो गई है कि परमाणु हथियार रखने वाले देश भी सीधे परमाणु हमले का जोखिम नहीं उठा पा रहे हैं। लेकिन इससे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को और गति मिल सकती है, क्योंकि वह अब हर कीमत पर खुद को सुरक्षित करना चाहेगा। वैश्विक स्तर पर यह भी सवाल उठता है कि जब कई देश खुद परमाणु संपन्न हैं, तो वे दूसरों को इससे रोकने का नैतिक अधिकार कैसे रखते हैं। स्थायी शांति तभी संभव है जब परमाणु हथियारों का पूर्ण उन्मूलन हो। पूर्वी एशिया में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए अमेरिका लगातार प्रयास कर रहा है। चीन को तटस्थ रहने के लिए मनाने की कोशिश की जा सकती है, क्योंकि ईरान को चीन और रूस से समर्थन मिलने की खबरें हैं। इसी बीच उत्तर कोरिया ने लंबी दूरी की मिसाइल इंजन का परीक्षण कर स्थिति को और जटिल बना दिया है। ताइवान मुद्दा भी सुलझता नहीं दिख रहा। बहरहाल, ट्रंप की नीतियों पर अमेरिका के भीतर ही सवाल उठ रहे हैं। बढ़ती महंगाई, आर्थिक दबाव और युद्ध के असर से जनता सड़कों पर है।
भारत में भी तेल और गैस की स्थिति को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। सरकार भले दावे कर रही हो कि स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन जमीनी स्तर पर रसोई गैस की लंबी कतारें इन दावों पर सवाल खड़े कर रही हैं। अंततः यह पूरा घटनाक्रम दर्शाता है कि वैश्विक राजनीति अब बहुध्रुवीय टकराव की ओर बढ़ रही है, जहां सैन्य शक्ति के साथ-साथ आर्थिक, कूटनीतिक और सामाजिक मोर्चों पर भी संघर्ष तेज होता जा रहा है।




