सरकारी फंड में कमीशन के लिए ठेकेदारों से घंटों मीटिंग, शिकायतकर्ताओं व आरटीआई एक्टिविस्ट से मिलने में परहेज

मुंबई। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार में कुछ कमीशनखोर अधिकारी उनकी छवि को धूमिल करने में लगे हुए हैं। म्हाडा के मुम्बई झोपड़पट्टी सुधार मंडल, जिसे स्लम बोर्ड के नाम से भी जाना जाता है, के माध्यम से लोकसभा सदस्यों, विधानसभा सदस्यों, विधान परिषद सदस्यों तथा अन्य सरकारी विकास निधियों से मुंबई के विकास कार्य किए जाते हैं। इन निधियों का बड़ा हिस्सा झोपड़पट्टी क्षेत्रों में खर्च किया जाता है, फिर भी वहां के निवासी आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। इसका मुख्य कारण कमीशनखोरी को माना जा रहा है।
स्लम बोर्ड में कार्यरत कुछ कार्यकारी अभियंताओं की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है। बताया जाता है कि उन्होंने अपने केबिन के दरवाजों को इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से लैस कर रखा है, जो फिंगर सिस्टम से खुलते हैं। ऐसा लगता है मानो यह कोई कार्यालय नहीं बल्कि बैंक का लॉकर हो। हैरानी की बात यह है कि ऐसे दरवाजे स्लम बोर्ड के सीओ के केबिन में भी नहीं हैं, जबकि म्हाडा के अन्य मंडलों में भी किसी कार्यकारी अभियंता के कार्यालय में इस तरह की व्यवस्था नहीं देखी जाती। पूर्व उपनगर क्षेत्र के कार्यकारी अभियंता नितिन डोंगरे पर भी आरोप हैं कि वे आम लोगों से मिलना पसंद नहीं करते और अधिकतर समय ठेकेदारों के साथ लंबी बैठकों में व्यस्त रहते हैं। उनके अधीन उप अभियंता भी कार्यालय से गायब रहते हैं। शाखा अभियंता का फील्ड में रहना समझा जा सकता है, लेकिन उप अभियंताओं की अनुपस्थिति पर सवाल उठ रहे हैं, जिसका जवाब कार्यकारी अभियंता देना भी नहीं चाहते। यही नहीं कार्यकारी अभियंता नितिन डोंगरे का नेम प्लेट भी गायब है। यही स्थिति पूरे स्लम बोर्ड में देखने को मिल रही है, जिस पर उप मुख्य अभियंता दीप्ती ज्ञानोबा काले और सीओ सतीश भारतीय नियंत्रण लगाने में कहीं न कहीं विफल दिखाई दे रहे हैं।
इसके अलावा मुम्बई स्लम बोर्ड से जुड़े आरटीआई मामलों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। आरटीआई कार्यकर्ताओ को राज्य सूचना आयोग तक चक्कर लगाने के बाद भी जानकारी प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकारी निधि के दुरुपयोग की जांच कब होगी? और मुंबई स्लम बोर्ड के कामों में पारदर्शिता कब आएगी? जनप्रतिनिधियों की निधि का उपयोग कहां और कैसे किया जा रहा है, इसकी जानकारी ऑनलाइन सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही है? साथ ही यह भी चर्चा में है गृहनिर्माण विभाग ने नितिन डोंगरे जैसे अभियंताओं की नियुक्ति किन आधारों पर की गई है।




