
पालघर। वसई–विरार नगर निगम चुनावों में हितेंद्र ठाकुर की बहुजन विकास अघाड़ी (बीवीए) ने बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों को करारी शिकस्त देते हुए शानदार प्रदर्शन किया है। बीवीए के 71 उम्मीदवारों की जीत के साथ पार्टी नगर निगम में सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है। चुनावी नतीजों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) दूसरे स्थान पर रही, जिसके 43 उम्मीदवार विजयी हुए। वहीं शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) महज़ एक सीट पर सिमट गई। कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार गुट) और शिवसेना (शिंदे गुट) समेत अन्य प्रमुख दल चुनावों में कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाए। इसके विपरीत एआईएमआईएम, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसी छोटी पार्टियों ने एक-एक सीट जीतकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
जीत के बाद हितेंद्र ठाकुर का हमला
भारी जीत के बाद बीवीए प्रमुख हितेंद्र ठाकुर ने इस सफलता का श्रेय पार्टी कार्यकर्ताओं को दिया और चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा- शेर अभी भी ज़िंदा है, और यह हमारे कार्यकर्ताओं की ताकत की वजह से है। कार्यकर्ताओं की जय हो। उन्होंने दिन-रात मेहनत कर इस चुनाव को अपने हाथों में लिया। ठाकुर ने आरोप लगाया कि यदि ईवीएम में छेड़छाड़, वोटर लिस्ट में हेरफेर और वोटों के ट्रांसफर जैसी कथित गड़बड़ियां न होतीं, तो बीवीए 100 सीटों का आंकड़ा पार कर सकती थी।
वोटिंग प्रक्रिया पर उठाए सवाल
वोटर पहचान को लेकर भी ठाकुर ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा- डिजीलॉकर एक मान्य आईडी है, जिसका इस्तेमाल हम एयरपोर्ट पर करते हैं, तो फिर वोटिंग के लिए इसे मान्यता क्यों नहीं दी गई? इसे कैसे सही ठहराया जा सकता है? हालांकि बीवीए के मजबूत प्रदर्शन के बावजूद पार्टी को कुछ अहम सीटों पर झटका भी लगा। हार्दिक राउत, पंकज ठाकुर और किरण ठाकुर जैसे वरिष्ठ नेता चुनाव जीतने में असफल रहे।
तटीय राजनीति में ठाकुर की मजबूत पकड़
बहुजन विकास अघाड़ी के संस्थापक और प्रमुख हितेंद्र ठाकुर को महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्र के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है। ज़मीनी स्तर पर मजबूत पकड़ और स्थानीय मुद्दों पर फोकस की बदौलत उन्होंने बीवीए को खासकर वसई–विरार नगर निगम में एक सशक्त राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित किया है। चुनाव अभियान के दौरान जहां महायुति (बीजेपी–शिवसेना शिंदे गुट) ने विकास के वादों के जरिए बीवीए को चुनौती देने की कोशिश की, वहीं महा विकास अघाड़ी ने शहरी शासन के मुद्दों को केंद्र में रखकर प्रचार किया। इसके बावजूद जनादेश ने एक बार फिर वसई–विरार में बीवीए की जमीनी ताकत और कार्यकर्ता आधारित राजनीति पर मुहर लगा दी।




