Sunday, March 15, 2026
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भारत-पाक संघर्ष पर सोशल मीडिया पोस्ट करने पर गिरफ्तार छात्रा को बॉम्बे हाई कोर्ट ने दी जमानत, सरकार को लगाई फटकार

मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार को पुणे की 19 वर्षीय छात्रा को जमानत दे दी, जिसे भारत-पाकिस्तान शत्रुता पर सोशल मीडिया पोस्ट साझा करने के चलते गिरफ्तार किया गया था। अदालत ने उसकी तत्काल रिहाई का आदेश भी दिया और राज्य सरकार को “कट्टरपंथी प्रतिक्रिया” के लिए कड़ी फटकार लगाई। न्यायमूर्ति गौरी गोडसे और सोमशेखर सुंदरसन की अवकाशकालीन पीठ ने टिप्पणी की, “यह बिल्कुल चौंकाने वाला है कि सरकार ने एक छात्रा के साथ कठोर अपराधी जैसा व्यवहार किया।” अदालत ने कहा कि छात्रा को गिरफ्तार ही नहीं किया जाना चाहिए था, क्योंकि उसने पोस्ट हटाकर पश्चाताप व्यक्त किया और माफी भी मांगी थी।
“क्या राज्य चाहता है कि छात्र बोलना बंद कर दें?” – हाई कोर्ट
पीठ ने आदेश दिया कि यरवदा जेल के अधिकारी छात्रा को मंगलवार शाम तक रिहा करें, ताकि वह अपनी कॉलेज परीक्षा में शामिल हो सके। कोर्ट ने छात्रा को निष्कासित करने संबंधी कॉलेज के आदेश को निलंबित करते हुए कॉलेज को हॉल टिकट जारी करने का भी निर्देश दिया।
अदालत ने कहा, यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें लड़की को हिरासत में रखा जाए। किसी छात्र द्वारा ऐसी पोस्ट करना अधिक से अधिक अविवेकपूर्ण कार्य कहा जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि कॉलेज ने बिना स्पष्टीकरण का मौका दिए जल्दबाजी में निष्कासन का फैसला किया, जो अनुचित है।
राज्य की ‘कट्टर प्रतिक्रिया’ अनुचित: न्यायालय
छात्रा को भारत सरकार की नीति की आलोचना करने वाले एक पोस्ट को इंस्टाग्राम पर साझा करने के कारण गिरफ्तार किया गया था। उसने यह पोस्ट 7 मई को किया, लेकिन दो घंटे के भीतर हटाकर माफी मांग ली थी। हालांकि, उसे 9 मई को कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया और फिर कोंढवा पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया। छात्रा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता फरहाना शाह ने जमानत और एफआईआर रद्द करने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। न्यायालय ने छात्रा को जमानत दे दी और परिक्षा में शामिल होने की अनुमति दी।
कॉलेज की भूमिका पर भी सवाल
कोर्ट ने कॉलेज प्रशासन की भी आलोचना की और कहा कि एक शैक्षणिक संस्थान का कार्य केवल अकादमिक शिक्षा देना नहीं, बल्कि छात्रों को सुधारने और मार्गदर्शन देने का भी है। “एक गलती को सुधार का अवसर देने के बजाय, आपने उसे अपराधी बना दिया,” कोर्ट ने टिप्पणी की। याचिकाकर्ता ने कहा कि निष्कासन आदेश मनमाना, असंवैधानिक और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। उसने यह भी तर्क दिया कि उसने पोस्ट दुर्भावनापूर्ण भावना से नहीं, बल्कि गलती से साझा किया था। पोस्ट हटाने और माफी के बाद भी उसे धमकियों का सामना करना पड़ा।

राज्य की दलील और न्यायालय की प्रतिक्रिया
राज्य की ओर से अतिरिक्त सरकारी वकील पी.पी.काकड़े ने कहा कि छात्रा की पोस्ट राष्ट्रीय हित के खिलाफ थी, लेकिन अदालत ने इसे अस्वीकार करते हुए कहा, क्या एक छात्रा की सोशल मीडिया पोस्ट से राष्ट्रीय हित को नुकसान होगा, जिसने माफ़ी मांग ली हो?” कोर्ट ने दो टूक कहा, राज्य की ऐसी प्रतिक्रिया ही युवाओं को कट्टर बना सकती है।”

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