
मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने सोमवार को महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री बाबा सिद्दीकी की हत्या के मामले में गिरफ्तार आरोपी आकाशदीप कारज सिंह को ज़मानत दे दी। कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर प्रॉसिक्यूशन की ओर से पेश किया गया मटीरियल पहली नज़र में सिंह को कथित ऑर्गनाइज़्ड क्राइम साज़िश से जोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है। जस्टिस नीला गोखले ने टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रॉसिक्यूशन का पूरा मामला मुख्य रूप से सिंह द्वारा किए गए दो कॉल पर आधारित है और “सिर्फ़ एक कॉल करने से ही किसी व्यक्ति का ऑर्गनाइज़्ड क्राइम सिंडिकेट से कनेक्शन साबित नहीं होता।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे किसी भी संबंध को ट्रायल के दौरान ही साबित करना होगा। 22 वर्षीय सिंह इस हाई-प्रोफाइल केस में ज़मानत पाने वाले पहले आरोपी बन गए हैं। 66 वर्षीय बाबा सिद्दीकी की 12 अक्टूबर, 2024 को उनके बेटे और पूर्व विधायक ज़ीशान सिद्दीकी के बांद्रा (पूर्व) खेरनगर स्थित कार्यालय के बाहर तीन हमलावरों द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में अब तक पुलिस 26 आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है और जेल में बंद गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई के भाई अनमोल बिश्नोई पर साज़िश रचने का आरोप लगाते हुए महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाइज़्ड क्राइम एक्ट (मकोका) के तहत मामला दर्ज किया गया है। इस वर्ष की शुरुआत में दाखिल चार्जशीट में अनमोल को वांछित आरोपी बताया गया है। पंजाब के फाज़िल्का ज़िले के निवासी सिंह को नवंबर 2024 में गिरफ्तार किया गया था और इससे पहले उनकी ज़मानत याचिका सेशन कोर्ट द्वारा खारिज कर दी गई थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने पाया कि प्रॉसिक्यूशन का मुख्य तर्क यह था कि सिंह ने किसी दूसरे व्यक्ति के फोन हॉटस्पॉट का इस्तेमाल कर एक सह-आरोपी को दो कॉल किए थे, लेकिन इस स्तर पर ऐसा कोई ठोस मटीरियल सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो सके कि सिंह को ऑर्गनाइज़्ड क्रिमिनल गतिविधियों की जानकारी थी या उसने उनमें सक्रिय भूमिका निभाई थी। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि मुख्य सह-आरोपी के कथित कबूलनामे में सिंह का नाम शामिल नहीं है। अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए भी कोर्ट इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा कि सिंह के खिलाफ़ आरोप प्रथम दृष्टया सही साबित होते हैं। कोर्ट ने उनकी कम उम्र और किसी भी पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड के अभाव को भी ध्यान में रखा। अंततः कोर्ट ने 1 लाख रुपये के निजी मुचलके पर, लोकल ज़मानत और सख़्त शर्तों के साथ उन्हें रिहा करने का आदेश दिया। उन्हें महाराष्ट्र से बाहर यात्रा करने पर रोक लगाई गई है और गवाहों को प्रभावित न करने के सख़्त निर्देश दिए गए हैं। कोर्ट ने साफ किया कि यह आदेश केवल ज़मानत याचिका तक सीमित है और किसी भी शर्त के उल्लंघन पर प्रॉसिक्यूशन ज़मानत रद्द कराने के लिए स्वतंत्र होगा।




