
मुंबई (इंद्र यादव)। आज की राजनीति धीरे-धीरे जनसेवा के मूल उद्देश्य से भटककर एक ऐसे खतरनाक खेल में बदलती नजर आ रही है, जहां सत्ता हासिल करने की होड़ में आम जनता, खासकर गरीब वर्ग, सबसे बड़ा मोहरा बनता जा रहा है। बड़े-बड़े बंगलों और बंद कमरों में बैठकर रणनीतियां तैयार होती हैं, लेकिन उनका असर सड़कों पर दिखाई देता है—जहां हिंसा, आगजनी और खून-खराबा होता है।विशेषज्ञों और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि जब जनता अपने मूल मुद्दों—रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं—को लेकर सवाल उठाने लगती है, तब उनका ध्यान भटकाने के लिए भावनात्मक मुद्दों, धर्म और जाति का सहारा लिया जाता है। सोशल मीडिया के जरिए अफवाहें और भ्रामक सूचनाएं फैलाकर युवाओं को भड़काया जाता है, जिससे एक ऐसी भीड़ तैयार होती है जिसे खुद यह भी नहीं पता होता कि वह किसके हित में संघर्ष कर रही है।ऐसे हालात में जब हिंसा भड़कती है, तो इसकी सबसे बड़ी कीमत आम आदमी को चुकानी पड़ती है। किसी भी झड़प या गोलीबारी में जान गंवाने वाला शायद ही कभी किसी प्रभावशाली व्यक्ति का परिजन होता है। वह अक्सर वही होता है जो रोज मेहनत कर अपने परिवार का पेट पालता है। उसकी मौत खबरों में एक आंकड़ा बनकर रह जाती है, लेकिन उसके पीछे टूटे हुए परिवार की कहानी कहीं दर्ज नहीं होती।एक व्यक्ति की मौत के साथ ही उसके पूरे परिवार का भविष्य दांव पर लग जाता है—बुजुर्ग माता-पिता सहारे से वंचित हो जाते हैं, पत्नी को अकेले जीवन का संघर्ष झेलना पड़ता है और बच्चों की शिक्षा व भविष्य अधर में लटक जाता है।इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि असली जिम्मेदार कौन है? वह व्यक्ति जिसने पत्थर उठाया, या वह जिसने उसे ऐसा करने के लिए उकसाया? अक्सर देखा जाता है कि कानून की पकड़ में वही लोग आते हैं जो सीधे तौर पर घटनाओं में शामिल होते हैं, जबकि पर्दे के पीछे से माहौल बनाने वाले लोग सार्वजनिक मंचों पर खुद को निर्दोष साबित करते नजर आते हैं।समाज के जानकारों का मानना है कि अब जरूरत इस बात की है कि आम जनता जागरूक बने और किसी भी तरह के उकसावे या भ्रामक प्रचार से दूर रहे। जब तक लोग धर्म और जाति के नाम पर भड़काए जाने से बचेंगे नहीं, तब तक इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाना मुश्किल होगा।आखिरकार, सबसे बड़ी जिम्मेदारी आम नागरिक की ही है कि वह अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को प्राथमिकता दे, और किसी भी ऐसी गतिविधि का हिस्सा बनने से बचे जो हिंसा और अराजकता को बढ़ावा देती हो। क्योंकि सत्ता के इस खेल में सबसे बड़ा नुकसान उसी का होता है, जो सबसे कमजोर होता है।




