
मुंबई। खरीफ सीजन 2026 को ध्यान में रखते हुए राज्य में किसानों को खाद की कमी न हो, इसके लिए सख्त निर्देश जारी किए गए हैं। बुधवार को कृषि मंत्री दत्तात्रय भरणे ने कृषि विभाग को निर्देश दिया है कि अप्रैल और मई महीने में ही यूरिया और डीएपी का पर्याप्त आरक्षित स्टॉक तैयार रखा जाए, ताकि किसानों को किसी भी परिस्थिति में परेशानी न हो। मंत्रालय में आयोजित समीक्षा बैठक में उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी कंपनी या विक्रेता किसानों को खाद के साथ अन्य उत्पाद खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। यदि ऐसा पाया गया, तो संबंधित कंपनियों और विक्रेताओं के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। बैठक में कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारी और विभिन्न खाद कंपनियों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। मंत्री भरणे ने कहा कि खाद उत्पादक कंपनियां तालुका स्तर पर कृषि अधिकारियों से समन्वय कर आपूर्ति की योजना बनाएं और उसी के अनुसार वितरण सुनिश्चित करें। साथ ही यह भी निर्देश दिया गया कि घाऊक विक्रेता केवल उसी जिले में खाद बेच सकेंगे, जिसके लिए उन्हें आवंटन मिला है। उन्होंने यह भी कहा कि जिन विक्रेताओं के पास पहले से 20 मीट्रिक टन या उससे अधिक खाद का स्टॉक मौजूद है, उन्हें नया स्टॉक नहीं दिया जाएगा। खाद की बिक्री पॉस मशीन के माध्यम से रियल-टाइम में करना अनिवार्य किया गया है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे। कृषि मंत्री ने बताया कि संभावित वैश्विक या युद्ध जैसी परिस्थितियों के बावजूद खाद की आपूर्ति बाधित न हो, इसके लिए सरकार सतर्क है। साथ ही रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करने के लिए नैनो खाद, जैविक खाद और हरी खाद के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के अनुसार ही खाद का उपयोग करें। इसके अलावा बीज उपचार के लिए राइजोबियम, एजोटोबैक्टर और पीएसबी जैसे जैविक उर्वरकों के उपयोग को बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है। ड्रोन के जरिए नैनो खाद के छिड़काव को प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे लागत कम और उत्पादन बेहतर होगा। मंत्री भरणे ने यह भी स्पष्ट किया कि खाद की बिक्री और वितरण खाद नियंत्रण आदेश 1985 और आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के तहत नियंत्रित है। किसी भी तरह की अनियमितता पाए जाने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।सरकार का लक्ष्य है कि राज्य में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देते हुए 1.81 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को इसके अंतर्गत लाया जाए, जिससे किसानों की लागत घटे और जमीन की उर्वरता में सुधार हो।




