Thursday, February 19, 2026
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कोष से कल्याण तक: मध्य प्रदेश बजट में सुशासन का शास्त्रीय सूत्र

राहुल कोठारी
‘कोषमूलो हि धर्मश्च राज्यं चापि प्रतिष्ठिम् ’ महाभारत के शांतिपर्व में इस श्लोक का अर्थ यह है कि राज्य और धर्म, दोनों का आधार सुदृढ़ कोष है। यह श्लोक केवल प्राचीन राजधर्म का दार्शनिक सूत्र नहीं, बल्कि आधुनिक शासन-व्यवस्था का भी शाश्वत मार्गदर्शक सिद्धांत है। जिस राज्य का राजकोष सुदृढ़, अनुशासित और दूरदर्शी हो, वही राज्य सुशासन, सामाजिक न्याय और आर्थिक समृद्धि का स्थायी प्रतिमान स्थापित कर सकता है। मध्यप्रदेश का 2026-27 का 4.38 लाख करोड़ रुपये का बजट इसी शास्त्रीय दर्शन की समकालीन अभिव्यक्ति है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रस्तुत यह बजट विकास की व्यापक दृष्टि का घोषणापत्र है। जहाँ आर्थिक अनुशासन, सामाजिक संवेदनशीलता और निवेशोन्मुख नीति का संतुलित समन्वय स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
विराट आकार, व्यापक दृष्टि और आर्थिक आत्मविश्वास
4,38,317 करोड़ रुपये का यह बजट मध्यप्रदेश की आर्थिक क्षमता और प्रशासनिक आत्मविश्वास का उद्घोष है। यह विस्तार केवल व्यय वृद्धि का संकेत नहीं देता, बल्कि इस बात का द्योतक है कि राज्य ने अपने राजस्व संसाधनों को सुदृढ़ किया है और वित्तीय अनुशासन को बनाए रखा है। राजकोषीय घाटे को नियंत्रित दायरे में रखते हुए पूंजीगत व्यय में उल्लेखनीय वृद्धि करना इस बात का प्रमाण है कि सरकार ने विकास और संतुलन के बीच सामंजस्य स्थापित किया है। यह संतुलन ही सुशासन की पहचान है।
यहां पर अर्थशास्त्र का सूत्र स्मरणीय है।
कोषपूर्वा: सर्वारम्भा: अर्थात सभी कार्यों का प्रारंभ कोष से होता है। जब कोष सशक्त होता है, तभी राज्य विकास की योजनाओं को गति और स्थायित्व प्रदान कर सकता है। डॉ. मोहन यादव ने इसी सिद्धांत को व्यवहार में परिणत करते हुए पहले आर्थिक आधार को मजबूत किया और फिर योजनाओं का विस्तार सुनिश्चित किया।
कर नीति में संतुलन और संवेदनशीलता
मनुस्मृति का यह प्रसिद्ध श्लोक आज भी नीति-निर्माण में प्रासंगिक है
यथा मधु समादत्ते रक्षन् पुष्पाणि षट्पद:
तद्वद् राज्ञा समादेयं राष्ट्रादबलिमदु:खितम्
जैसे मधुमक्खी फूलों को क्षति पहुँचाए बिना मधु ग्रहण करती है, वैसे ही शासक को प्रजा से कर लेना चाहिए, बिना उन्हें कष्ट दिए। मध्यप्रदेश की कर नीति इसी संतुलन की परिचायक है। करदाताओं पर अतिरिक्त बोझ डाले बिना राजस्व वृद्धि के लिए डिजिटलीकरण, पारदर्शिता और कर प्रशासन में सुधार को प्राथमिकता दी गई है। इससे राज्य की आय में स्वाभाविक वृद्धि होती है और नागरिकों का विश्वास भी सुदृढ़ रहता है। यह नीति उद्योग जगत और मध्यम वर्ग दोनों के लिए आश्वस्तकारी है। स्थिर कर-प्रणाली निवेश-अनुकूल वातावरण का निर्माण करती है, जो आर्थिक विस्तार का आधार बनती है।
लाड़ली बहना: आर्थिक स्वाभिमान का विस्तार
लाड़ली बहना योजना के अंतर्गत लाखों महिलाओं को प्रतिमाह आर्थिक सहायता प्रदान करना महिला सशक्तिकरण की दिशा में प्रदेश का ऐतिहासिक कदम था, जो इस वित्तीय वर्ष भी जारी रहेगा। इस योजना के दूरगामी प्रभाव स्पष्ट हैं। परिवारों की आय-संरचना में स्थिरता आती है। ग्रामीण बाजारों में क्रय-शक्ति बढ़ती है। महिलाएँ आर्थिक निर्णयों में सक्रिय भागीदारी निभाती हैं। यह केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान की स्थापना है।
किसान खुशहाल: अन्नदाता का सुदृढ़ीकरण
महाभारत में कहा गया है,
अर्थो हि मूलं पुरुषाथार्ना ’
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चार पुरुषार्थों में ‘अर्थ’आधार है। कृषि प्रधान राज्य में अर्थ का मूल स्रोत किसान है। बजट में किसानों के लिए सिंचाई विस्तार, फसल बीमा सुदृढ़ीकरण, समर्थन मूल्य व्यवस्था और कृषि यंत्रीकरण जैसे प्रावधान किए गए हैं। इससे कृषि उत्पादन में वृद्धि और आय में स्थिरता सुनिश्चित होती है। किसान की समृद्धि केवल ग्रामीण क्षेत्र की उन्नति नहीं, बल्कि राज्य की समग्र आर्थिक संरचना की मजबूती है।
पूंजीगत व्यय: दीर्घकालिक विकास की आधारशिला
बजट में पूंजीगत व्यय पर विशेष बल दिया गया है। सड़क, पुल, औद्योगिक कॉरिडोर, जल संसाधन और नगरीय अधोसंरचना में निवेश से राज्य के आर्थिक भविष्य को सुदृढ़ आधार मिलता है।
चाणक्य नीति का वचन यहाँ प्रासंगिक है।
तस्मान्नित्योत्थितो राजा कुर्यादथार्नुशासनम्
अर्थात शासक को निरंतर उद्यमशील रहकर अर्थ-व्यवस्था का अनुशासन करना चाहिए। डॉ. मोहन यादव का नेतृत्व इसी सक्रियता का उदाहरण है। अधोसंरचना में निवेश से रोजगार सृजन, औद्योगिक विस्तार और निवेश आकर्षण को गति मिलती है।
ज्ञानी मॉडल: समावेशी विकास की परिकल्पना
गरीब, युवा, अन्नदाता और नारी, इन चार वर्गों को केंद्र में रखकर विकास की जो रूपरेखा तैयार की गई है, वह समावेशी सोच का प्रमाण है। गरीबों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ, युवाओं के लिए रोजगार और कौशल विकास, किसानों के लिए समर्थन और महिलाओं के लिए आर्थिक सशक्तिकरण, यह चतुर्भुज विकास की संतुलित अवधारणा प्रस्तुत करता है।
शास्त्रीय सिद्धांतों का आधुनिक अनुप्रयोग
महाभारत, मनुस्मृति और अर्थशास्त्र के श्लोकों में वर्णित राजकोषीय सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं। सुदृढ़ कोष से सुशासन संभव है। संतुलित कर नीति से प्रजा संतुष्ट रहती है। आर्थिक अनुशासन से समृद्धि आती है। डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रस्तुत यह बजट इन सिद्धांतों का आधुनिक रूपांतरण है। यह विकास के चटक रंगों से सुसज्जित दस्तावेज है। जहाँ बहना निहाल है, किसान खुशहाल है, युवा आशावान है और उद्योगों को खुला आकाश प्राप्त है। अंतत:, कोषमूलो हि धर्मश्च राज्यं चापि प्रतिष्ठितम्। यह शाश्वत वाक्य आज भी सत्य है, और मध्यप्रदेश का यह बजट उसी सत्य का सजीव प्रमाण है। (लेखक मध्यप्रदेश भारतीय जनता पार्टी के महामंत्री हैं।)

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