
नई दिल्ली। राजधानी की साकेत कोर्ट ने दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना को 25 साल पुराने मानहानि के मामले में बड़ी न्यायिक राहत देते हुए दोषमुक्त कर दिया है। यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर द्वारा वर्ष 2000 में दायर किया गया था। गुरुवार को सुनाए गए फैसले में कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा पेश किए गए साक्ष्य और गवाह आरोपों की पुष्टि के लिए पर्याप्त नहीं हैं। साकेत कोर्ट के न्यायिक मजिस्ट्रेट राघव शर्मा ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि मामले में अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में असफल रहा। कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि मार्च 2025 में मेधा पाटकर की उस अर्जी को खारिज किया जा चुका है, जिसमें उन्होंने अतिरिक्त गवाहों की जांच की मांग की थी। तब कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह आवेदन मुकदमे की वास्तविक जरूरत के बजाय “सुनवाई में देरी करने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास” प्रतीत होता है। कोर्ट रिकॉर्ड के मुताबिक, इस मामले में असाधारण देरी का बड़ा कारण स्वयं शिकायतकर्ता का रवैया रहा। दस्तावेजों से सामने आया कि वर्ष 2005 से 2023 के बीच मेधा पाटकर कम से कम 94 बार अदालत की कार्यवाही से अनुपस्थित रहीं। रिपोर्ट के अनुसार, 2005 में समन जारी होने के बावजूद पाटकर करीब सात वर्षों तक कोर्ट में पेश नहीं हुईं और पहली बार 2012 में अदालत में उपस्थित हुईं। इसके बाद भी उन्होंने साक्ष्य दर्ज कराने के लिए 46 से अधिक बार स्थगन की मांग की। मुख्य परीक्षा के बाद वे क्रॉस-एग्जामिनेशन के लिए भी लंबे समय तक अनुपस्थित रहीं और इसके चलते 24 बार सुनवाई टलवाई गई।
कोर्ट का निष्कर्ष: मामले में ठोस आधार नहीं
यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ था जब मेधा पाटकर ने वीके सक्सेना पर एक विज्ञापन के जरिए उनकी छवि खराब करने का आरोप लगाया था। उस समय सक्सेना अहमदाबाद स्थित एनजीओ नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज के अध्यक्ष थे। हालांकि, वर्षों चली सुनवाई और बार-बार ली गई तारीखों के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है। इसलिए वीके सक्सेना को दोषमुक्त किया जाता है।
पहले के मामले में मेधा पाटकर को मिली थी सजा
गौरतलब है कि जुलाई 2024 में इसी साकेत कोर्ट ने एक अन्य मानहानि मामले में—जो वीके सक्सेना द्वारा दायर किया गया था—मेधा पाटकर को 5 महीने की जेल और 10 लाख रुपये के मुआवजे की सजा सुनाई थी। उस फैसले में कोर्ट ने माना था कि पाटकर ने सक्सेना के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर उनकी प्रतिष्ठा को जानबूझकर नुकसान पहुंचाया था। ताजा फैसले में कोर्ट ने अप्रत्यक्ष रूप से यह भी रेखांकित किया कि 25 वर्षों तक किसी मामले को खींचना और दर्जनों बार पेश न होना न्याय की मूल भावना के खिलाफ है। यह सिद्धांत दोहराया गया कि देरी से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है। यह फैसला न केवल इस विशेष मामले में महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि अदालतें अब लंबी देरी और प्रक्रिया के दुरुपयोग को गंभीरता से देख रही हैं।




