
मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में कल्याण-डोंबिवली महानगर पालिका (केडीएमसी) चुनाव नतीजों के बाद बड़ा उलटफेर सामने आया है। सत्ता समीकरण बदलते ही शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सांसद संजय राउत ने मनसे और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के बीच बने अप्रत्याशित गठबंधन पर कड़ा प्रहार किया है। राउत ने शिंदे गुट की तुलना ‘मराठियों के बीच की एमआईएम’ से करते हुए इसे मराठी मानुष के साथ विश्वासघात करार दिया। संजय राउत ने कहा कि शिंदे गुट पूरी तरह से बेईमान और महाराष्ट्रद्रोही है, जिसने न केवल बालासाहेब ठाकरे के विचारों के साथ, बल्कि पूरे महाराष्ट्र के साथ गद्दारी की है। उन्होंने आरोप लगाया कि जो लोग इन गद्दारों का साथ दे रहे हैं, वे भी उसी श्रेणी में आते हैं। राउत के अनुसार, सत्ता और स्वार्थ के लिए विचारधारा की बलि दी जा रही है, जो मराठी अस्मिता के खिलाफ है। मनसे द्वारा शिंदे गुट को दिए गए समर्थन पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए राउत ने कहा कि इसे केवल स्थानीय निर्णय बताकर टाला नहीं जा सकता। उन्होंने दावा किया कि इस फैसले से खुद मनसे प्रमुख राज ठाकरे भी अंदर ही अंदर व्यथित और परेशान हैं। राउत ने राज ठाकरे को सलाह दी कि जो स्थानीय नेता पार्टी की मूल नीतियों के खिलाफ जाकर काम कर रहे हैं, उन्हें तुरंत निलंबित किया जाना चाहिए। राउत ने कांग्रेस का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह अंबरनाथ में भाजपा के साथ जाने वाले कांग्रेस के 12 पार्षदों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया, उसी तरह की राजनीतिक हिम्मत मनसे नेतृत्व को भी दिखानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सत्ता के लालच में बार-बार पाला बदलने वाले नेता न तो विचारधारा के प्रति ईमानदार हैं और न ही जनता के प्रति। अपने बयान में संजय राउत ने ऐसे नेताओं को “राजनीतिक मनोरोगी” करार दिया, जो एक चुनाव चिन्ह पर जीतकर बाद में दूसरे गुट की मदद करते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग केवल निजी स्वार्थ के लिए राजनीति कर रहे हैं। राउत ने यह भी स्पष्ट किया कि उद्धव ठाकरे ने इस पूरे घटनाक्रम को बेहद गंभीरता से लिया है और महाराष्ट्र की जनता गद्दारी करने वालों को कभी माफ नहीं करेगी। दलबदल के मुद्दे पर राउत ने न्यायपालिका को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि दलबदल की इस बीमारी को समय रहते रोकना सर्वोच्च न्यायालय की जिम्मेदारी है, लेकिन सुनवाई में लगातार हो रही देरी से लोकतंत्र को नुकसान पहुंच रहा है। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि अदालत द्वारा मामलों को टालना देश के पतन में अप्रत्यक्ष सहयोग जैसा है। राउत ने दावा किया कि इस रवैये के कारण आम जनता का न्याय व्यवस्था से भरोसा लगातार कम हो रहा है।




