Friday, February 13, 2026
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सोहराबुद्दीन–प्रजापति कथित फर्जी एनकाउंटर मामला: बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपील पर फैसला सुरक्षित रखा

मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने शुक्रवार को गैंगस्टर सोहराबुद्दीन शेख और उसके कथित सहयोगी तुलसीराम प्रजापति के 2005 के बहुचर्चित कथित फर्जी एनकाउंटर मामले में सभी 22 आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ दायर अपील पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंखड की खंडपीठ ने सोहराबुद्दीन शेख के भाइयों रुबाबउद्दीन शेख और नायबउद्दीन शेख की ओर से दायर अपील पर सुनवाई पूरी होने के बाद निर्णय सुरक्षित रखा। यह अपील दिसंबर 2018 में मुंबई की स्पेशल सीबीआई कोर्ट द्वारा सभी 22 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देती है।
वर्षों बाद हुई अंतिम सुनवाई
यह अपील अप्रैल 2019 में दायर की गई थी, जबकि इसकी अंतिम सुनवाई सितंबर 2025 में जाकर पूरी हो सकी। मामले का एक अहम पहलू यह है कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने खुद बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ कोई अपील दायर नहीं की। 8 अक्टूबर 2025 को हुई सुनवाई के दौरान, सीबीआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने हाई कोर्ट को बताया था कि एजेंसी ने स्पेशल कोर्ट के फैसले को स्वीकार कर लिया है और उसे चुनौती नहीं देगी। दिसंबर 2018 में स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने कहा था कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है। अदालत ने माना कि: सोहराबुद्दीन, कौसर बी और तुलसीराम प्रजापति की हत्या की किसी साजिश का ठोस सबूत नहीं है। आरोपियों की इस कथित साजिश में भूमिका साबित नहीं हो सकी। सीबीआई यह भी सिद्ध नहीं कर पाई कि अधिकारियों और कथित रूप से शामिल स्थानीय राजनेताओं के बीच कोई आपराधिक सांठगांठ थी। इन्हीं आधारों पर सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया गया था। सोहराबुद्दीन के भाइयों की ओर से दायर अपील में ट्रायल पर ही सवाल उठाए गए हैं। अपील में आरोप लगाया गया है कि ट्रायल के दौरान गंभीर प्रक्रियागत गड़बड़ियां हुईं। कुछ गवाहों ने बाद में दावा किया कि उनकी गवाही को ट्रायल कोर्ट ने सही तरीके से दर्ज नहीं किया। इसी आधार पर बरी किए जाने के फैसले को रद्द कर दोबारा ट्रायल कराने की मांग की गई है। सोहराबुद्दीन शेख को नवंबर 2006 में गुजरात पुलिस द्वारा अहमदाबाद के पास एक कथित एनकाउंटर में मारे जाने का दावा किया गया था। उसकी पत्नी कौसर बी की भी कथित तौर पर हत्या कर दी गई थी। इसके बाद दिसंबर 2006 में तुलसीराम प्रजापति, जिसे इस मामले का अहम चश्मदीद गवाह माना जाता था, एक अन्य कथित एनकाउंटर में मारा गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जांच सीबीआई को सौंपी और ट्रायल को मुंबई की स्पेशल सीबीआई कोर्ट में स्थानांतरित किया था। अब बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले पर सबकी निगाहें टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि 2018 का बरी किए जाने का फैसला बरकरार रहेगा या मामले में दोबारा सुनवाई का रास्ता खुलेगा।

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