
जलवायु संकट के दौर में किसानों की आय और भूमि की उर्वरता बचाने पर राज्यपाल का जोर
मुंबई। वैश्विक स्तर पर गहराते जलवायु संकट को देखते हुए महाराष्ट्र के कृषि विश्वविद्यालयों को पारंपरिक देशी बीजों का संस्कार कर उनका वैज्ञानिक उन्नयन करना चाहिए, ताकि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी किसानों की आय सुनिश्चित हो सके। इसके साथ ही राज्य में प्राकृतिक खेती की एक व्यापक क्रांति लाने में विश्वविद्यालयों को अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए, ऐसा आह्वान महाराष्ट्र के राज्यपाल एवं राज्य के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति आचार्य देवव्रत ने किया है। लोकभवन, मुंबई से गुरुवार को कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और राज्य के कृषि एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के साथ ऑडियो-विजुअल माध्यम से संवाद करते हुए राज्यपाल यह विचार व्यक्त कर रहे थे। बैठक में कृषि विभाग के अपर मुख्य सचिव विकास चंद्र रस्तोगी, ‘पोकरा’ परियोजना के परियोजना संचालक परिमल सिंह, राज्य के कृषि एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालयों के कुलपति, राज्यपाल के सचिव डॉ. प्रशांत नारनवरे, ‘आत्मा’ के संचालक सुनील बोरकर सहित कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।
संकर बीजों पर चिंता, देशी बीजों पर शोध की जरूरत
राज्यपाल ने कहा कि संकर बीज किसानों के लिए संकट का कारण बनते जा रहे हैं। ये बीज महंगे होने के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों की खपत भी बढ़ाते हैं। संकर बीजों से उत्पादित अनाज में स्वाद और पोषण मूल्य दोनों कम हो जाते हैं। इसलिए कृषि विश्वविद्यालयों को पारंपरिक देशी बीजों पर गंभीर शोध कर उनका उन्नयन करना चाहिए।
प्राकृतिक खेती के लिए मॉडल फार्म और प्रशिक्षण
राज्यपाल ने निर्देश दिए कि सभी कृषि विज्ञान केंद्रों में प्राकृतिक खेती के प्रचार-प्रसार के लिए ‘मॉडल फार्म’ विकसित किए जाएं और किसानों के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएं। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती को केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि जनआंदोलन का रूप दिया जाना चाहिए।
भूमि और भावी पीढ़ियों की सुरक्षा का सवाल
प्राकृतिक खेती को राज्यपाल ने एक पवित्र और ईश्वरीय कार्य बताया। उन्होंने कहा कि भावी पीढ़ियों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यदि भूमि की उर्वरता और गुणवत्ता को सुधारना है, तो प्राकृतिक खेती के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। राज्यपाल ने चिंता जताई कि कई किसान दुकानदारों की सलाह पर बिना जानकारी के यूरिया, डीएपी और कीटनाशकों का उपयोग कर रहे हैं, जिससे खेती को भारी नुकसान हो रहा है। इस संदर्भ में विश्वविद्यालयों को किसानों का प्रबोधन करने की आवश्यकता है।
गुजरात के शोध को आगे बढ़ाने की सलाह
उन्होंने बताया कि गुजरात के चार कृषि विश्वविद्यालय पिछले तीन वर्षों से प्राकृतिक खेती पर शोध कर रहे हैं। ऐसे में महाराष्ट्र के विश्वविद्यालयों को नए सिरे से शोध शुरू करने के बजाय गुजरात में हुए शोध को आगे बढ़ाना चाहिए। गुजरात में तैयार की गई शोध पत्रिकाएं और पुस्तकें राज्य के विश्वविद्यालयों को उपलब्ध कराई जाएंगी।
जल और स्वास्थ्य पर रसायनों का दुष्प्रभाव
राज्यपाल ने अपने हालिया ग्राम भ्रमण का अनुभव साझा करते हुए बताया कि आनंद जिले के 25 गांवों में भूजल में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ने से पानी पीने योग्य नहीं रहा है। दूषित पानी के कारण लोगों को गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। यह रासायनिक खेती के दुष्परिणामों का प्रत्यक्ष उदाहरण है। राज्यपाल ने कहा कि किसानों को यह समझाना जरूरी है कि केवल एक गाय होने पर भी प्राकृतिक खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। उन्होंने महाराष्ट्र में साहिवाल, थारपारकर, कांकरेज और गिर जैसी देशी गायों के संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि इससे खेती को बल मिलेगा और किसानों की आय में भी वृद्धि होगी। इस अवसर पर ‘आत्मा’ के संचालक सुनील बोरकर ने प्राकृतिक खेती से संबंधित विस्तृत प्रस्तुतीकरण भी किया।



