
मुंबई। राज्य में होने वाले 29 महानगर पालिका चुनावों में मुंबई महानगर पालिका और ठाणे महानगर पालिका के चुनाव भाजपा और शिंदे गुट की शिवसेना—दोनों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गए हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने पूरी रणनीतिक तैयारी के साथ चुनावी मैदान में उतरने की योजना बना ली है। महायुति में अधिकांश सीटों को लेकर सहमति बन चुकी है और बैठकों का दौर लगातार जारी है। नामांकन प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने मिलकर महाविकास आघाड़ी को घेरने का एक विस्तृत राजनीतिक खाका तैयार किया है, जो मुंबई महानगर पालिका के इतिहास में नया अध्याय जोड़ सकता है। भाजपा की रणनीति साफ है—मुंबई में अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़कर अपने उम्मीदवारों को जिताना और महापौर पद पर सीधा दावा ठोकना। वहीं दूसरी ओर, ठाणे महानगर पालिका में शिंदे गुट की शिवसेना भी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। ठाणे को शिवसेना (शिंदे गुट) का गढ़ माना जाता है और यहां अधिकतम सीटें जीतकर अपना महापौर बनाने का लक्ष्य तय किया गया है।
मुंबई में महाविकास आघाड़ी के भीतर भी नए राजनीतिक समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं। शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) पक्ष प्रमुख उद्धव ठाकरे और मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने गठबंधन का ऐलान किया और मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने भी दावा किया कि मुंबई में अगला महापौर हमारा होगा। मौजूदा स्थिति में शरद पवार की एनसीपी, उद्धव ठाकरे की शिवसेना और मनसे के साथ चुनाव लड़ने जा रही है, जबकि कांग्रेस और अजित पवार गुट की एनसीपी पहले ही अलग-अलग चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अजित पवार गुट के उम्मीदवार महायुति को फायदा पहुंचाएंगे या नुकसान, और क्या कांग्रेस महाविकास आघाड़ी से अलग रहकर 2017 के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन कर पाएगी? राजनीतिक जानकारों की मानें तो कांग्रेस के अलग चुनाव लड़ने से महाविकास आघाड़ी को कोई बड़ा फायदा होता फिलहाल दिखाई नहीं दे रहा, बल्कि इसका अप्रत्यक्ष लाभ महायुति को मिल सकता है। इसी बीच, हाल ही में भाजपा के महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने स्पष्ट बयान दिया कि “मुंबई में महापौर भाजपा का ही होगा।” इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। चर्चा यह भी है कि कहीं महापौर पद की होड़ में भाजपा के कार्यकर्ता शिंदे गुट के शिवसेना उम्मीदवारों के खिलाफ भीतरखाने काम न करने लगें। सत्ता की राजनीति में ऐसा होना असंभव भी नहीं माना जा रहा। गौरतलब है कि कई दशकों से मुंबई महानगर पालिका में अविभाजित शिवसेना का ही महापौर बनता आया है, लेकिन इस बार भाजपा ने जिस तरह संगठित रणनीति और सियासी गणित के साथ तैयारी की है, उससे मुकाबला बेहद दिलचस्प और निर्णायक बनता जा रहा है। अब यह देखना शेष है कि भाजपा की यह रणनीति कितना असर दिखाती है और 16 जनवरी 2026 को होने वाली मतगणना यह स्पष्ट कर देगी कि मुंबई व ठाणे का महापौर किसके हाथों में जाता है।



