
स्वतंत्र लेखक- इंद्र यादव
उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में, जहां कभी हलवाई की दुकानों से महकती मिठाइयां और मोहल्लों में बच्चों की हंसी गूंजती थी, वहां आज एक नीला ड्रम खड़ा है– क्रूरता का प्रतीक, जो दो परिवारों की जिंदगियां हमेशा के लिए बदल गया। सौरभ राजपूत हत्याकांड, जो आठ महीने पहले 3 मार्च को घटित हुआ, न केवल एक व्यक्ति की जान ले गया, बल्कि उसके साथ-साथ उसके परिवार की उम्मीदें, मुस्कान रस्तोगी के घर की खुशियां और पूरे समाज की शांति को भी कुचल दिया। आज जब मुस्कान का परिवार अपना घर ‘बिकाऊ है’ का पोस्टर लगाकर मेरठ छोड़ने की तैयारी कर रहा है, तो यह दृश्य दिल को चीर देता है। यह सिर्फ एक घर नहीं बिक रहा, बल्कि दर्द की यादें, सामाजिक बहिष्कार और टूटे रिश्तों का बोझ बिक रहा है। सौरभ के परिवार का दर्द तो शब्दों में बयां करना असंभव है। एक युवा पति, जो अपनी पत्नी मुस्कान से बेइंतहा प्यार करता था, उसी की साजिश का शिकार हो गया। प्रेमी साहिल शुक्ला के साथ मिलकर मुस्कान ने सौरभ की हत्या की, शव को चार टुकड़ों में काटा और नीले ड्रम में सीमेंट भरकर छिपा दिया। यह क्रूरता सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सौरभ की मां-बाप, भाई-बहन आज भी उस खाली कमरे को देखकर रोते हैं, जहां कभी उनकी बहू मुस्कान हंसती-बोलती थी। अब वे बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने की मांग कर रहे हैं – अगर वह सौरभ का है, तो अपनाएंगे। यह मांग कितनी पीड़ादायक है! एक तरफ पति की हत्या का सदमा, दूसरी तरफ आने वाले बच्चे की अनिश्चितता। सौरभ का परिवार टूट चुका है; उनकी आंखों में बस आंसू और सवाल हैं – क्यों। क्या प्यार इतना अंधा हो सकता है कि इंसानियत खत्म हो जाए। दूसरी ओर, मुस्कान रस्तोगी का परिवार भी इसी आग में जल रहा है। प्रमोद रस्तोगी, जो ज्वेलरी की दुकान चलाते थे, आज ग्राहकों के बहिष्कार से परेशान हैं। उधार देने वाले मुंह फेर चुके हैं। उनकी छोटी बेटी ट्यूशन पढ़ाती थी, लेकिन अब अभिभावक बच्चों को उसके पास नहीं भेजते। पत्नी कविता और बेटा राहुल – पूरा परिवार सामाजिक तिरस्कार की आंधी में फंसा है। प्रमोद ने मीडिया से कहा, “यहां सिर्फ दर्दनाक यादें बची हैं। हम नई जिंदगी शुरू करने के लिए शहर छोड़ रहे हैं।” कल्पना कीजिए, वह घर जहां मुस्कान बड़ी हुई, जहां शादियां हुईं, उत्सव मनाए गए – अब वह ‘बिकाऊ’ है। यह फैसला ट्रॉमा की गहराई बताता है। जेल में बंद मुस्कान गर्भवती है, और उसके कुछ करीबी रिश्तेदार ही मिलने जाते हैं। परिवार का यह पलायन सिर्फ जगह बदलना नहीं, बल्कि अपराधबोध, शर्म और अकेलेपन से भागना है। वे मेरठ छोड़कर कहां जाएंगे। क्या नई जगह पर पुरानी यादें नहीं सताएंगी।यह हत्याकांड समाज की चिंता को भी उजागर करता है। मेरठ जैसे शहर, जहां पड़ोसी एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं, आज डर और अविश्वास से भर गए हैं। लोग फुसफुसाते हैं, नजरें चुराते हैं। क्या प्रेम के नाम पर ऐसी क्रूरता जायज है। अवैध संबंध, धोखा और हत्या – ये सिर्फ व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को चीरने वाले घाव हैं। बच्चे सुनते हैं, बड़े डरते हैं। महिलाओं की सुरक्षा, वैवाहिक रिश्तों की पवित्रता – सब पर सवाल उठ रहे हैं। समाज आज भी इसकी निंदा करता नहीं थकता, लेकिन क्या हम सब जिम्मेदार नहीं। पड़ोसियों ने संकेत नहीं देखे परिवारों ने चेतावनी नहीं सुनी। यह मामला हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आधुनिकता के नाम पर रिश्तों की नींव कितनी कमजोर हो गई है। नीला ड्रम आज भी कहीं खड़ा होगा, सीमेंट में दफन सौरभ की चीखों के साथ। दो परिवार बिखर गए, समाज आहत है। मुस्कान का परिवार शहर छोड़ रहा है, लेकिन दर्द तो साथ जाएगा। सौरभ के परिजन न्याय की आस में हैं, लेकिन न्याय क्या टूटे दिलों को जोड़ सकता है। यह दुखभरी कहानी हमें सिखाती है। प्यार में संयम रखो, रिश्तों में विश्वास बनाओ, और क्रूरता से दूर रहो। मेरठ की यह त्रासदी कभी न भुलाई जाएगी, क्योंकि इसमें दफन हैं इंसानियत की कराहें। भगवान दोनों परिवारों को शांति दे, और समाज को सबक।




