
मुंबई। न्यायपालिका की साख को झकझोर देने वाली बड़ी कार्रवाई में बंबई उच्च न्यायालय ने राज्य के दो सत्र न्यायाधीशों को बर्खास्त कर दिया है। इनमें सतारा जिला सत्र न्यायाधीश धनंजय निकम पर रिश्वतखोरी का आरोप है, जबकि पालघर के जिला सत्र न्यायाधीश इरफान शेख पर नशे का सेवन और तस्करी में शामिल होने का गंभीर आरोप है। दोनों को एक अक्टूबर से सेवा से बर्खास्त करने के आदेश जारी किए गए हैं।
ड्रग्स मामले में फंसे न्यायाधीश इरफान शेख
बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, इरफान शेख का नाम 2021 के बहुचर्चित कॉर्डेलिया क्रूज ड्रग्स केस में सामने आया था, जिसमें शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को एनसीबी ने गिरफ्तार किया था। इस मामले के दौरान एक मजिस्ट्रेट को भी हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई थी, जिसे बाद में गुप्त रूप से रिहा कर दिया गया।
आरटीआई कार्यकर्ता केतन तिरोडकर ने इस संबंध में हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें दावा किया गया था कि मजिस्ट्रेट इरफान शेख क्रूज पर नशे में धुत पाए गए थे और उन्हें सीधे अस्पताल ले जाया गया था। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि शेख ने एनसीबी द्वारा जब्त किए गए मादक पदार्थों का सेवन किया और उन्हें बॉलीवुड में अपने कुछ दोस्तों के साथ साझा भी किया। बताया गया कि उन्हें पहले सैफी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन अस्पताल ने केस का कागज़ बनाने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उन्हें गुप्त रूप से नायर अस्पताल में भर्ती कराया गया। बाद में उनके मूत्र के नमूने पी.डी. हिंदुजा अस्पताल भेजे गए, जहां 7 अक्टूबर 2021 को आई रिपोर्ट में ड्रग्स के सेवन की पुष्टि हुई। इस घटना ने न्यायपालिका की गरिमा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि जब कोई मजिस्ट्रेट अदालत में रखे गए सबूतों का ही सेवन करे, तो यह न्याय व्यवस्था पर गहरा आघात है। उन्होंने सीबीआई को इस मामले की जांच का आदेश दिया था।
धनंजय निकम पर रिश्वत मांगने का आरोप
दूसरे मामले में, सतारा जिला सत्र न्यायाधीश धनंजय निकम पर एक आरोपी की जमानत मंजूर करने के लिए 5 लाख रुपये रिश्वत मांगने का आरोप है। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने इस मामले में जाल बिछाकर निकम को रंगे हाथों गिरफ्तार किया था।
एसीबी ने निकम और तीन अन्य को सतारा सत्र न्यायालय क्षेत्र के एक होटल से हिरासत में लिया था। इसके बाद जब इन सभी ने अदालत में अग्रिम जमानत के लिए याचिका दायर की, तो न्यायमूर्ति नितिन बोरकर की पीठ ने एसीबी द्वारा पेश किए गए प्रत्यक्ष सबूतों को देखते हुए उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया।
न्यायपालिका में शुचिता पर सवाल
इन दोनों मामलों ने न्यायपालिका की नैतिकता और विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। उच्च न्यायालय ने इस कार्रवाई के माध्यम से यह स्पष्ट संकेत दिया है कि न्यायिक सेवा में भ्रष्टाचार या आचरणहीनता को किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। राज्य में यह पहली बार नहीं है जब किसी न्यायिक अधिकारी पर इस तरह के गंभीर आरोप लगे हों, लेकिन यह कार्रवाई न्यायिक जवाबदेही के लिए एक मिसाल के रूप में देखी जा रही है।




