
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कुख्यात गैंगस्टर अरुण गवली की समयपूर्व रिहाई को लेकर दायर याचिका को खारिज करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश पर रोक जारी रखी। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने सुनवाई के दौरान चर्चित हिंदी फिल्म ‘शोले’ का मशहूर डायलॉग उद्धृत करते हुए कहा, “सो जा बेटा, नहीं तो गब्बर आ जाएगा”, और इसे इस मामले के लिए उपयुक्त करार दिया। गवली की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नित्या रामकृष्णन ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को हृदय रोग और फेफड़ों की बीमारी है, तथा सह-आरोपियों को जमानत दी जा चुकी है। उन्होंने कहा कि बॉम्बे हाई कोर्ट का समयपूर्व रिहाई का आदेश सही था। हालांकि, शीर्ष अदालत ने 3 जून के अपने आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि वह फिलहाल कोई राहत देने के पक्ष में नहीं है और मामले की अगली सुनवाई 20 नवंबर को होगी। सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार के वकील राजा ठाकरे ने बताया कि गवली के खिलाफ 46 से अधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें लगभग 10 हत्या के मामले शामिल हैं। उन्होंने कहा कि मकोका कानून के तहत दोषियों को छूट पाने के लिए कम से कम 40 साल की सजा काटनी होती है। गवली को 2009 में दोषी ठहराया गया था और वह 17 साल से जेल में है। गवली की ओर से दलील दी गई कि 2006 की नीति लागू होनी चाहिए, क्योंकि दोषसिद्धि उसी अवधि में हुई थी। इस नीति के तहत उम्र और शारीरिक अक्षमता के आधार पर छूट दी जा सकती है। उनके वकील ने कहा कि गवली अब 72 वर्ष का हो चुका है और मेडिकल बोर्ड ने उसे कमजोर घोषित किया है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल अंतरिम राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि उनकी दी गई रोक जारी रहेगी। गवली मुंबई के शिवसेना पार्षद कमलाकर जामसांडेकर की 2007 में हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है और उसका दावा है कि उसने छूट नीति की सभी शर्तों का पालन किया है।