Tuesday, January 13, 2026
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संपादकीय: विश्व में कहां खड़े हैं हम?

अमेरिकी टाइम्स में दुनिया के सौ लोगों में एक भी भारतीय का नहीं होना बेहद शर्म की बात है। टाइम मैगजीन ने 2025 के प्रतिभावान लोगों की एक लिस्ट बनाई है, जिसमें ट्रंप, एलन मस्क, बांग्लादेश के चीफ एडवाइजर मोहम्मद युनुस, मैक्सिको के राष्ट्रपति क्लाउडिया, अमेरिकी वाणिज्य सचिव हार्वर्ड लूटनिक, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस, डब्ल्यू.एच.ओ. प्रमुख टेड्रोस, जर्मन रूढ़िवादी नेता फ्रेडरिक, दक्षिण कोरियाई नेता ली जेमयांग, अभिनेता डेमी मूर, स्नूप डॉग, सेरेना विलियम्स, एड शीरन, वर्टेक्स फार्मास्युटिकल की भारतीय मूल की सी.ई.ओ. केवल रमानी के अलावा ढेर सारे प्रतिभाशाली नेताओं, राजनीति, विज्ञान, व्यापार, मनोरंजन जगत की हस्तियों का शुमार है, लेकिन एक भी भारतीय उद्योगपति, अर्थशास्त्री कोई भी शामिल नहीं होने के कारण भारत को शर्मसार होना पड़ा है। पिछले साल एक्ट्रेस आलिया भट्ट और पहलवान साक्षी मलिक ने देश का नाम रोशन किया था, परंतु नई सूची में कथित विश्वगुरू मोदी और बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह और पीएम के राजनीतिक सलाहकार में एक का भी नाम नहीं है। बीजेपी की राजनीति ने देश को हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद, बाबर-औरंगज़ेब और देश के भीतर मुस्लिम ही नहीं, दलितों और पिछड़े लोगों को हाशिए पर रख दिया गया है। दुनिया के राष्ट्र वैज्ञानिक शोधों में लगे हैं, नई-नई तकनीक की खोज कर रहे हैं, और हम हैं कि बुलडोजर चलाकर मुस्लिमों के घर गिराने, बीजेपी को छोड़कर सभी विपक्षी दलों के नेताओं को देशद्रोही होने का सर्टिफिकेट बांटने में लगे हैं। असम में हो या यूपी, या मध्यप्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र हो या राजस्थान—सर्वत्र बुलडोजर द्वारा खुद जज बनकर न्याय करने में लगे हैं। हम वैज्ञानिक, सेना हेतु हथियार जैसे रिसर्च की व्यवस्था करने की जगह विदेश से तकनीकी उधार ले रहे हैं। सत्ता प्राप्ति के लिए दंगे करवा रहे हैं। अराजकता फैलाने में हमारा दुनिया में कोई शानी नहीं है। गरीबी खत्म करने के लिए पंच किलो राशन दे रहे हैं। रोजगार के संसाधन और राष्ट्रीय संपत्तियां पूंजीपतियों को सौंप रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग की चिंता छोड़कर कथित विकास के लिए जंगल कटवाने में लगे हैं। शिक्षा को माफियाओं के हवाले करने में लगे हैं। चिकित्सा व्यवस्था की हमें चिंता नहीं है। चिकित्सा के लिए देशवासियों की जिंदगी कफन तक उतार लेने वाले धूर्त प्राइवेट अस्पतालों को सौंप चुके हैं। बेरोजगारी बढ़ाकर भगवा और नीला झंडा फहराने में लगे हैं। देश की सुरक्षा के नाम पर खिलवाड़ कर रहे हैं। विदेशी राष्ट्रों में बैन की गई अंग्रेजी दवाओं के निर्माण और फार्मास्युटिकल कंपनियों द्वारा जनता को लूटने की छूट दे रहे हैं। प्रतिभाशाली छात्र अगर दलित है, तो उसे शोध करने के लिए एडमिशन नहीं दे रहे। आईटी, सीबीआई, ईडी, चुनाव आयोग और न्यायालयों पर कब्जा करने में लगे हैं। यूनिवर्सिटियों में प्रतिभावान शिक्षक नहीं, विशेष विचारधारा के अयोग्य लोगों की नियुक्ति कर पूरे एजुकेशन सिस्टम को अपने कब्जे में रख रहे हैं। शिक्षा, चिकित्सा, मनरेगा और इसरो के बजट कम कर रहे हैं। हमें विज्ञान-ज्ञान से नफरत हो गई है। हम देशवासियों को धर्म की अफीम चटाकर उन्हें मानसिक गुलाम बना रहे हैं। बेरोजगार युवाओं को कांवड़ यात्रा और मस्जिद के सामने मजहब विशेष को गरियाने में अपनी शान समझने लगे हैं। हम देश की प्रतिभाओं को विदेश पलायन करने को बाध्य कर रहे हैं। टैक्स की भरमार कर अरबपतियों को विदेश भगाने में लगे हैं। देश के 140 करोड़ नागरिकों को पूंजीपतियों की दया पर छोड़ने में लगे हैं। शिक्षितों, ज्ञानियों, न्यायशास्त्रियों की उपेक्षा करने में ही हम अपनी शान समझने लगे हैं। फिर तो कैसे देश में प्रतिभा बचे? जब शिक्षा की भ्रूण हत्या पर तुले हों, तो ईश्वर भी देश को बचा नहीं सकते। हमारे देवता मंदिरों में पत्थर बनकर बिठा दिए गए हैं। फिर भी हम सोच नहीं पाते कि यदि मंदिरों में बैठे भगवान अपनी खुद की सुरक्षा नहीं कर सकते, तो हमारी सुरक्षा क्या करेंगे? जब देश में मंदिरों के कंगूरे सोने के मढ़े जाने लगे और शिक्षालय की छत चुने लगे, तो देश का हो चुका विकास।

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